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Saturday, 8 August 2020

छत्तीसगढ़ी गजल-अरुण कुमार निगम *बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला*


गजल-अरुण कुमार निगम


*बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला*

मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

1212 212 122 1212 212 122



जिंकर कृपा ले बने तैं राजा, गरीब मन के तैं मान रख ले
अनाज खाबे तभे त जीबे, किसान मन के धियान रख ले।

धरे न सांगन कटारी मा तैं, बखत परे मा का काम आही
लड़ाई होही ता मात खाबे, तैं कतको महँगी मियान रख ले। 

बिहान होते निकल गए जी, कमाए खातिर दू-चार पइसा
मँझन कलेवा कहाँ ले पाबे, तैं बोरे-बासी अथान रख ले।

तैं नौकरी मा कमाबे पैसा, बिहाव करबे बनाबे कोठी
घरे ला मंदिर बना ले बाबू, ददा दाई कस सियान रख ले।

समय के धारा मा तन मछरिया बुढ़ाही कतको जतन करे मा
'अरुण' कहय धीर धर के बाबू तैं मन के फाँदा जवान रख ले।

अरुण कुमार निगम



गजल

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