छत्तीसगढ़ी गजल - कन्हैया साहू "अमित"
बहर-2122, 2122, 212,
नाव के सरकार हे जय राम जी।
गोठ भर दमदार हे जय राम जी।
काम के कोनो ठिकाना नइ इहाँ,
फेर बड़ मतवार हे जय राम जी।
मीठलबरा हा कलेचुप साधथे,
बस चिटिक हुसियार हे जय राम जी।
पार परिहा सब सुवारथ जानथें,
कौन दुख बँटवार हे जय राम जी।
एक रुपिया मा किलो भर झोंक लव।
कोन अब बनिहार हे जय राम जी।
कोढ़िया के ओढ़हर बस एकठन।
रोजिना इतवार हे जय राम जी।
भेस सादा भर धरे ले का 'अमित'।
मन कुलुप अँधियार हे जय राम जी।
गजलकार - कन्हैया साहू "अमित"
भाटापारा, छत्तीसगढ़