छत्तीसगढ़ी मुकम्मल गजल- मनीराम साहू 'मितान'
बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
1212 212 122 1212 212 122
अपन बनौकी तहूॅ बनाले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
भजन के गंगा डुबक नहाले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
हटर हटर मा बुड़े रथच गा, कमाय के धुन चढ़े हवय बड़,
असल रतन ले लगन लगाले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
पहा जही जी सबो हा देखत, कमाय धन जन सबो सरेखत,
समे रहत हरि मदन मना ले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
कहत रथच जे जिनिस ला मोरे, सबो हवय गा निसार माया,
अपन बनक बर मुॅहू लमा ले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
कहाॅ भटकथस जतर खतर गा, हवय सबो सुख किसन शरन मा,
छुटय चरन झन बने जमा ले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
असल समे मा ये काम आही, बॅधाय गठरी सॅगेच जाही,
बने धरम पुन रहत कमाले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
नटत हवच तैं मनी बचन ले, जपन करे बर दिये रहे गा,
अपन धनी ले मया जगा ले, रमाय रख मन किसन कन्हैया।
मनीराम साहू 'मितान'
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Friday, 14 August 2020
छत्तीसगढ़ी मुकम्मल गजल- मनीराम साहू 'मितान'
Wednesday, 12 August 2020
छत्तीसगढ़ी मुकम्मल गजल- मनीराम साहू 'मितान'
छत्तीसगढ़ी मुकम्मल गजल- मनीराम साहू 'मितान'
बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
1212 212 122 1212 212 122
परे डगर मोह लोभ चिखला, अटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
लगत हवय मन परे दुबट्टा, भटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
करत रथे बस अपन मने के, सही गलत नइ करय चिन्हारी,
भराय लद्दी कपट के डबरा, सटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
कहाॅ जनाथे अपन गलत हा, गलत दुसर के निकाल रखथे,
अबड़ अकड़थे सबन नजर मा, खटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
परो के धन बर नजर गड़ाथे, धरे सुवारथ मया बढ़ाथे,
जुआॅ असन ये असत् के मूड़ी, चटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
बिगाड़ पासा रखे हवय ये, ममा शकुनि कस चलाय गोंटी,
तरी न उप्पर कहूॅ अधर मा, लटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
हवय मगन ये भुलाय सॅइता, हदर हदर बड़ करे हदरहा,
सुनय नही ये सबो के बाॅटा, गटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
रखे हवय बड़ गुमान पोंसे, लगय कभू ये हवय गा इत्तर,
कथे मनी सत् सॅगे मा रइहूॅ, मटक जही का गुनत रथवॅ मैं।
मनीराम साहू 'मितान'
गजल
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