छत्तीसगढ़ी गजल - जितेंद्र वर्मा खैरझिटिया
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नइ मिले शोहरत कभू बिन काम के।
कतको जग मा हे पड़े बिन नाम के।
काम कर कौड़ी कमा ना फोकटे,
धन सुबे आही सिराही शाम के।
धन असल ईमान अउ सम्मान हे,
सोन चाँदी हा हरे बस दाम के।
पद बढ़े अउ कद बढ़े सब सोंचथे,
फेर कोनो नइ चले सत थाम के।
चार दिन चलथे मया मातम इहाँ,
नाम रटते नित रबे श्री राम के।
झन जराबे गोठ मा दिल काखरो,
देंवता रिसहा अबड़ मन धाम के।
खैर नइहे खैरझिटिया के घलो,
ताव आगी कस बरे बड़ घाम के।
गजलकार - जितेंद्र वर्मा खैरझिटिया
बालको