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Friday, 7 June 2019

छत्तीसगढ़ी गजल - सूर्यकान्त गुप्ता

छत्तीसगढ़ी गजल - सूर्यकान्त गुप्ता

2122   2122   212

छोड़  के दल एक  सब चिचियात हें।
एक  झन ला उन  बने खिसियात हें।।

लक्ठियावत  हे चुनावी दिन इहाँ।
आम  जनता  ला इहाँ  लड़ियात हें।।

वाह  खुरसी  तोर बर  कतका मया।
पाय   बर तोला  सबो जुरियात हें।।

खोय  हें बेटा   गोसइँँया माई मन।
बाँट  के उनला  रकम भुलियात हें।।

पुरगे  हावय बीस  दिन बलिदान के।
लेहे'  बर बदला  लगय ढे'रियात  हें।।

नइये  चुप दुश्मन घलो तुम जान लौ।
बइठ  के मौका  उन्हूँ सो'रियात  हें।।

'कांत'  मनखे आज  के चतुरा हवँय।
बात  जल्दी   उन कहाँ  पतियात हें।।


गजलकार -सूर्यकांत गुप्ता, 'कांत'
सिंधिया नगर दुर्ग(छ.ग.)

Wednesday, 22 May 2019

छत्तीसगढ़ी गजल - सूर्यकान्त गुप्ता

छत्तीसगढ़ी गजल - सूर्यकान्त गुप्ता
【2122   2122   212】

लात के भूत

भूत वो बिन लात के मानय नही।
प्रेम के भाखा ल वो जानय नही।।

पीठ मा  तो भोंकथे हरदम छुरा।
मुँह अपन गा सामने लानय नही।।

हे इहों ज़ज़्बा के कहिथौं बड़ कमी।
लेहे'  बर बदला  कभू ठानय नही।।

वीर  सैनिक  बिन मिले आदेश के।
वो  अपन  बंदूक ला  तानय नहीं।।

मन मा कचरा तो भरे हे बैर के।
दोस्ती के छन्नी'  मा छानय नहीं।।

रात दिन बिख बीज बोथे फोकटे।
प्रेम रस ला घोर के सानय नहीं।।

'कांत'  खोना नइये  काँही जोश मा।
वो नफा नकसान पहिचानय नहीं।।

सादर जय जोहार...
सूर्यकान्त गुप्ता
सिंधिया नगर दुर्ग(छ.ग.)

गजल

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