गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
122 122 122 12
सड़क ला बनाये रहिस काल जी।
बने आज सब बर ये जंजाल जी।
बहाये रे पानी ते काबर बता।
सड़क के बना दे बुरा हाल जी।
हवेली खड़ा होत हावय उँखर।
दलाली करे खाय जे माल जी।
शिकायत करे कुछ न होवय सगा।
बड़े आदमी मन बने ढाल जी।
तुहीं ला फँसा तक ओ देही सखा।
चले लोग कानून के चाल जी।
रचनाकार-- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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Wednesday, 2 September 2020
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
Saturday, 1 August 2020
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212
देख तो राह में कोन आवत हवय।
जे दुपट्टा म मुखड़ा छुपावत हवय।
छोड़ सुध बुध ल गोपी चले जात हे।
कोन मधुबन म मुरली बजावत हवय।
तोर खाँसी ल तो सिर्फ खाँसी कहे।
मोर खाँसी करोना कहावत हवय।
काल के बात ला आज तक हे धरे।
देख कइसे के वो मुँह फुलावत हवय।
जेन रोटी तको ला चबा नइ सकय।
तेन कुकरी ल कइसे चबावत हवय।
भाग गे छोड़ के ओ शहर देख ले।
जब सुने की सिपाही बलावत हवय।
ताज देखे हजारों लगे भीड़ हे।
पर ददा के न मरघट ल भावत हवय।
छेद बादर म होगे हवय लागथे।
धार मूसल सही ओ गिरावत हवय।
पान खाके न तँय थूक देबे सखा।
फैल जाही करोना बतावत हवय।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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भोकवा कस रथे बात मानय नही।
सच गलत काय होथे ओ जानय नही।
देखथे रोज सपना बड़े होय के।
काम खातिर कभू खाक छानय नही।
खात रहिथे कलेवा कलेचुप सखी।
मोर खातिर कभू वो तो लानय नही।
वो भला हे भला चाहथे लोग बर।
काखरो बर वो गड्ढा ग खानय नही।
दूर रहिथे नशा पान ले ओ सदा।
धर बुराई अपन घर मा नानय नही।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212
गाँव के खार मा एक अधवार हे।
देवता जे बसे तेन रखवार हे।
झन उलझबे कका राह रेंगत कभू।
हर गली मा मिले एक मतवार हे।
वो कहाँ आय पाथे समे मा सखी।
वो जिहाँ जाय तिहँचे तो लगवार हे।
हाथ धोके पड़े मोर पाछू हवय।
तँय डरा झन मोरो तीर तलवार हे।
का डराथच तहूँ आय तूफान ला।
राम के नाम जब तोर पतवार हे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212
बिन बिहाये ले जिनगी बे रस हो जथे।
जे बिहाये त जिनगी ह फस हो जथे।
शेर जइसे दहाड़त फिरे आदमी।
होय सादी तहाँ गाय कस हो जथे।
रोज दुतकार खावत रथे रात दिन।
जस कुकुर होय धोबी के तस हो जथे।
लानबे जब बिहा के ता लूना रथे।
चार दिन मा ही ओ हा तो बस हो जथे।
चार झन के ये परिवार अबतक रहे।
बाढ़ के कुछ हि दिन मा जी दस हो जथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
Tuesday, 7 July 2020
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर
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212 212 212 2
काम कहिबे त टूरा मटकथे।
जोर से पाँव तक ला पटकथे।
देश मा बाढ़े बेरोजगारी।
काम खातिर हजारों भटकथे।
बाढ़ गे हे नशा खोर भारी।
रोज गुटखा गटागट गटकथे।
रूप मा तोर बइहा बने हँव।
फेर भैंगा जे आँखी खटकथे।
तोर घर रात मँय नइ तो आवँव।
ओ गली के कुकुर मन हटकथे।
चार टूरा गली तोर देखँव।
का बता तोर सेती फटकथे?
तय करे नइ सकय जेन मंजिल।
तेन मनखे अधर मा लटकथे।
बीच मा जे करत हे दलाली।
रोज कतकोन ला ओ झटकथे।
जे दुसर के करे जी बुराई।
ओखरे देह चिखला छटकथे।
बिन सुरक्षा बचाये ल जावय।
तेन दलदल म उँहचे सटकथे।
झन छुआछूत ला मान भाई।
मिल सबो ले मया बस चटकथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर
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काम कहिबे त टूरा मटकथे।
जोर से पाँव तक ला पटकथे।
देश मा बाढ़े बेरोजगारी।
काम खातिर हजारों भटकथे।
बाढ़ गे हे नशा खोर भारी।
रोज गुटखा गटागट गटकथे।
रूप मा तोर बइहा बने हँव।
फेर भैंगा जे आँखी खटकथे।
तोर घर रात मँय नइ तो आवँव।
ओ गली के कुकुर मन हटकथे।
चार टूरा गली तोर देखँव।
का बता तोर सेती फटकथे?
तय करे नइ सकय जेन मंजिल।
तेन मनखे अधर मा लटकथे।
बीच मा जे करत हे दलाली।
रोज कतकोन ला ओ झटकथे।
जे दुसर के करे जी बुराई।
ओखरे देह चिखला छटकथे।
बिन सुरक्षा बचाये ल जावय।
तेन दलदल म उँहचे सटकथे।
झन छुआछूत ला मान भाई।
मिल सबो ले मया बस चटकथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
Sunday, 5 July 2020
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर
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काम कहिबे त टूरा मटकथे।
जोर से पाँव तक ला पटकथे।
देश मा बाढ़े बेरोजगारी।
काम खातिर हजारों भटकथे।
बाढ़ गे हे नशा खोर भारी।
रोज गुटखा गटागट गटकथे।
रूप मा तोर बइहा बने हँव।
फेर भैंगा जे आँखी खटकथे।
तोर घर रात मँय नइ तो आवँव।
ओ गली के कुकुर मन हटकथे।
चार टूरा गली तोर देखँव।
का बता तोर सेती फटकथे?
तय करे नइ सकय जेन मंजिल।
तेन मनखे अधर मा लटकथे।
बीच मा जे करत हे दलाली।
रोज कतकोन ला ओ झटकथे।
जे दुसर के करे जी बुराई।
ओखरे देह चिखला छटकथे।
बिन सुरक्षा बचाये ल जावय।
तेन दलदल म उँहचे सटकथे।
झन छुआछूत ला मान भाई।
मिल सबो ले मया बस चटकथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर
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212 212 212 2
काम कहिबे त टूरा मटकथे।
जोर से पाँव तक ला पटकथे।
देश मा बाढ़े बेरोजगारी।
काम खातिर हजारों भटकथे।
बाढ़ गे हे नशा खोर भारी।
रोज गुटखा गटागट गटकथे।
रूप मा तोर बइहा बने हँव।
फेर भैंगा जे आँखी खटकथे।
तोर घर रात मँय नइ तो आवँव।
ओ गली के कुकुर मन हटकथे।
चार टूरा गली तोर देखँव।
का बता तोर सेती फटकथे?
तय करे नइ सकय जेन मंजिल।
तेन मनखे अधर मा लटकथे।
बीच मा जे करत हे दलाली।
रोज कतकोन ला ओ झटकथे।
जे दुसर के करे जी बुराई।
ओखरे देह चिखला छटकथे।
बिन सुरक्षा बचाये ल जावय।
तेन दलदल म उँहचे सटकथे।
झन छुआछूत ला मान भाई।
मिल सबो ले मया बस चटकथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
Sunday, 24 May 2020
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतकारीब मुसम्मन मकसुर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
अरकान-122 122 122 12
उतर जा उतर जा सबो बोलथे।
उतरहूँ कहाँ पाँव हा डोलथे।
अजब हे गजब हे जमाना सखा।
सरे राह रेंगत सबो छोलथे।
भले नइ धरावय रतन रेत के।
तभो लालची रेत ला झोलथे।
बने जब ले सरपंच बाई हवय।
बबा मन तको आजकल ठोलथे।
सम्हल के रबे काम जब हे गलत।
लगे कैमरा राज ला खोलथे।
मया मा मयारू मसक दिच नरी।
मया मान महुरा तको घोलथे।
भरे कोठरी काम आवय नही।
रथे जेन मुसुवा सबो फोलथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
बहरे मुतकारीब मुसम्मन मकसुर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
अरकान-122 122 122 12
उतर जा उतर जा सबो बोलथे।
उतरहूँ कहाँ पाँव हा डोलथे।
अजब हे गजब हे जमाना सखा।
सरे राह रेंगत सबो छोलथे।
भले नइ धरावय रतन रेत के।
तभो लालची रेत ला झोलथे।
बने जब ले सरपंच बाई हवय।
बबा मन तको आजकल ठोलथे।
सम्हल के रबे काम जब हे गलत।
लगे कैमरा राज ला खोलथे।
मया मा मयारू मसक दिच नरी।
मया मान महुरा तको घोलथे।
भरे कोठरी काम आवय नही।
रथे जेन मुसुवा सबो फोलथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
Monday, 4 May 2020
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
बड़े के कहे मान गंगा नहाले।
तरे जिंदगी जान गंगा नहाले।
बटोरत रहे जिंदगी भर खजाना।
समे आय कर दान गंगा नहाले।
चलत राह राही थिरा ले तनिक जी।
भजन के करत पान गंगा नहाले।
कहाँ धाम चारो भटकबे कका तँय।
बबा के रखे ध्यान गंगा नहा ले।
पढ़े जा पढ़े जा ये जिनगी गढ़े जा।
त डुबकी लगा ज्ञान गंगा नहाले।
चढ़े चार काँधा चले जब मुसाफिर।
सँगे जाय शमसान गंगा नहाले।
धरम के डगर मा करत काम नेकी।
बना अपनो पहिचान गंगा नहाले।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
बड़े के कहे मान गंगा नहाले।
तरे जिंदगी जान गंगा नहाले।
बटोरत रहे जिंदगी भर खजाना।
समे आय कर दान गंगा नहाले।
चलत राह राही थिरा ले तनिक जी।
भजन के करत पान गंगा नहाले।
कहाँ धाम चारो भटकबे कका तँय।
बबा के रखे ध्यान गंगा नहा ले।
पढ़े जा पढ़े जा ये जिनगी गढ़े जा।
त डुबकी लगा ज्ञान गंगा नहाले।
चढ़े चार काँधा चले जब मुसाफिर।
सँगे जाय शमसान गंगा नहाले।
धरम के डगर मा करत काम नेकी।
बना अपनो पहिचान गंगा नहाले।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
Wednesday, 29 April 2020
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतकारीब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
थिराले तनिक छाँव में आव राही।
चढ़े जे सुरुज साँझ के ढल ही जाही।
घना कोहरा छाय हे जिंदगी मा।
न जाने बिहनहा नवा कोन लाही।
हमर काय होही जी बीते घड़ी मा।
बुझाही दिया की अँजोरी ह आही।
सबो राह जोहत हवय हे विधाता।
लिखे भाग का हे ते कोने बताही।
समंदर के लहरा तको कम लगत हे।
उठे जेन अंतस लहर कब सिराही।
लगे चाँद सुग्घर रहे रात पुन्नी।
न जाने अमावस ह कइसे पहाही।
बरस बीत गे हे जवानी सिराये।
तभो राख राखे रखे का रखाही।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
बहरे मुतकारीब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
थिराले तनिक छाँव में आव राही।
चढ़े जे सुरुज साँझ के ढल ही जाही।
घना कोहरा छाय हे जिंदगी मा।
न जाने बिहनहा नवा कोन लाही।
हमर काय होही जी बीते घड़ी मा।
बुझाही दिया की अँजोरी ह आही।
सबो राह जोहत हवय हे विधाता।
लिखे भाग का हे ते कोने बताही।
समंदर के लहरा तको कम लगत हे।
उठे जेन अंतस लहर कब सिराही।
लगे चाँद सुग्घर रहे रात पुन्नी।
न जाने अमावस ह कइसे पहाही।
बरस बीत गे हे जवानी सिराये।
तभो राख राखे रखे का रखाही।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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