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Friday, 6 November 2020

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन


2212 2212 2212 2212  


खुद जाग के सब ला जगा होही बिहनिया तब कका। 

कर योग तँय आलस भगा होही बिहनिया तब कका। 


पढ़ लिख बने हुसियार बन सब मोह ला तँय छोड़ दे।

लालच म आ के झन ठगा होही बिहनिया तब कका।


बन कोढ़िया झन बइठ तँय चारी करत दिन भर इहाँ।

चल काम मा मन ला लगा होही बिहनिया तब कका। 


मन तोर बड़ अँधियार हे सब के बुरा बस सोंचथस।

आही सुरुज बनके सगा होही बिहनिया तब कका


मन आस रख कर काम तँय मिलही सफलता एक दिन।

अंतस जले जब बगबगा होही बिहनिया तब कका।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

ग़ज़ल-आशा देशमुख*

 *ग़ज़ल-आशा देशमुख*


*बहरे रजज़ मुस्समन सालिम*

*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन  *मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*

*2212  2212  2212  2212*



लक्ष्मण सही जी गीत माटी के गवैया कोन हे।

कण कण बसे जन जन बसे पीरा चिन्हैया कोन हे।1


फागुन धरे हे रंग आमा डार कुहके कोयली

रग रग खुशी भीगत हवय अइसन भिगैया कोन हे।2


गाड़ी मरारिन हा चढ़े पइसा घलो नइ पास मा

मन के दशा डर भाव ला पढ़के लिखैया कोन हे।3


गहदे तुमा के नार कस ये मन अबड़ झुमरत हवय

पबरित मया के बंधना ढेराअटैया कोन हे।4


बइठे सिंहासन पद गरब रमजे दरी ला पाँव मा

हपटे गिरे मन सँग चलव अइसन कहैया कोन हे।5।


हउँला रखे हे दोहरा तिरिया चलत हे बोह के

गहरा भरे हे भेद गा अइसन लिखैया कोन हे।6


ताजा हवय गोंदा चँदैनी आज तक ममहात हे

घुनही बँसुरिया ला मधुर सुर मा बजैया कोन हे।7



आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

गजल- मनीराम साहू‌ 'मितान'

 गजल-  मनीराम साहू‌ 'मितान'


बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन


2212 2212 2212 2212 


रद्दा अपन चतवार के चलते रहव बढ़ते रहव।

छोड़व फिकर अँधियार के चलते रहव बढ़ते रहव।


होवय नही चिटको कठिन लव ठान मन होही बुता,

अड़गा बिघन सब टार के चलते रहव बढ़ते रहव।


दीया बरय घट प्रेम के हाॅसी खुशी जिनगी चलय,

भिथिया कपट ओदार के चलते रहव बढ़ते रहव।


हे योजना अड़बड़ अकन आवव सबो लेवव‌ नफा,

कहना हवय सरकार के चलते रहव बढ़ते रहव।


हाबय भला सप्फा रखव घर द्वार अउ अँगना अपन,

राखव‌ गली खरहार के चलते रहव बढ़ते रहव।


चंचल‌‌ अबड़ होथे ये मन पोसे रथे तिसना गजब,

सँइता रखव‌ बइठार के चलते रहव बढ़ते रहव।


लिखथे मनी दिल‌ ले‌ गजल करथे दुवा सब बर सदा,

भल बर कथे संसार के चलते रहव बढ़ते रहव।


- मनीराम साहू‌ 'मितान'

गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी 


बहरे रजज मुस्समन सालिम

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलन

2212 2212 2212 2212


कइसे जमाना आय हे लाचार हे दाई ददा

ईलाज पानी बिन दवा बीमार हे दाई ददा


बेटा बहू मन मस्त गुलछर्रा उड़ावय रोज के 

औ एक दाना बर अपन मुँह फार हे दाई ददा


हरियर रहत ले सब चुहकथे रोज अड़बड़ के इहाँ 

जबले बुढ़ापा आय सुक्खा डार हे दाई ददा 


जिनगी खपा देथे अपन उन सोच लइका खुश रहय

औ अबके लइकामन ला लगथे भार हे दाई ददा


सेवा बजाले 'ज्ञानु' जीते जी इँखर तँय खूब रे 

जप तप इहाँ सब ब्यर्थ हे बस सार हे दाई ददा


ज्ञानु

गजल- मनीराम साहू‌ 'मितान'

 गजल-  मनीराम साहू‌ 'मितान'


बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन


2212 2212 2212 2212 


नित दिन कहूॅ भगवान के करबे भजन होही भला।

हिनहर सबो इंसान‌ के करबे जतन होही भला।


दाई ददा हें देव कस इॅकरे चरन मिलही सरग,

झन तैं सता सेवा बजा करले नमन होही भला।


ओखी करत बढ़वार के नरवा नदी झन पाट तैं,

काटॅव नही रुखवा अबड़ करले परन होही भला।


नित रेंग ले कुछ दूर गा ओधय नही ब्याधा कभू,

चंगा बना के राख तैं खुद के बदन होही भला।


जे जान देथे देश हित मरके अमर वो हो जथे

बन‌जा भगत आजाद अउ गाॅधी असन होही भला।


डोलय नही पत्ता घलो भगवान के मरजी बिना,

पर कर्म तोरे हाथ हे कुछ कर मनन होही भला।


सुन ले मनी अति मीठ हा करुहा जनाथे जान ले,

करहूॅ बुता सब नेत के तैं दे बचन होही भला।


- मनीराम साहू‌ 'मितान'

Monday, 5 October 2020

गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212  2212


बढ़िया करम कर रोज के।

सतगुण धरत चल खोज के।1


जौने निचट डरपोकना।

कविता करै वो ओज के।2


परिणाम बड़ होथे बुरा।

कखरो भी ओवर डोज के।3


नइ काम आये टेंड़गा।

हे माँग सिधवा सोज के।4


चंदन चुपर के माथ मा।

उपवास हे खा बोज के।5


पर ला कहे जे जंगली।

 ते ले मजा वनभोज के।6


होटल सिनेमा बार पब।

अड्डा हे मस्ती मौज के।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212  2212


घायल करे भाला सबे।

लालच करे लाला सबे।1


नेता गिरी मा का कहन।

बदलत दिखे पाला सबे।2


कतको हे जिम्मेदार बड़।

नइ होय मतवाला सबे।3


सोना मिटावय भूख ना।

नइ भाय ऊजाला सबे।4


बेरा बखत पानी घलो।

नइ देय नल नाला सबे।5


फल फूल पाही पेड़ हा।

कटगे हवे डाला सबे।6


पिसथे गहूँ के संग घुन।

नइ हे बुरा काला सबे।7


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...