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Friday, 1 January 2021

गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 ,गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*


*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*


*1222 1222 1222*


खुशी मा आन के अंगार बोहाबे।

अपन भर बर बता का प्यार बोहाबे।


बड़े होगे हवस बतिया घलो बढ़िया।

बने कइही कते यदि लार बोहाबे।


नदी मा पानी हे पूरा उतरबे झन।

कहूँ अँड़बे ता धारे धार बोहाबे।


गुरू ग्यानी गुनी बड़का के कर संगत।

कहा नइ मानबे हर बार बोहाबे।


बिना पतवार के डोंगा बने जिनगी।

बता लहरा बिना वो पार बोहाबे।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी 


बहरे हजज़ मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 

1222 1222 1222


भरम के भूत काबर मन मा पाले जी

बिना समझे तहूँ चिखला उछाले जी


सहा बारात के चुपचाप नखरा ला

भुला झन जाबे हरस तँय बेटी वाले जी


खुदे आ फँस जही सब तोर फाँदा मा

हवस तँय आनी बानी चारा डाले जी 


किसानी काम जेनें जानथे करथे

का करना हे अपन भत्ता बढ़ाले जी


भरोसा नइये कब का 'ज्ञानु' हो जाथे

मया के गोठ सब सँग गोठियाले जी


ज्ञानु

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन


1222 1222 1222 

  

नहा के जेन हर आही मजा पाही। 

फरा चीला तको खाही मजा पाही। 


बबा तापत हवय आगी जला भुर्री। 

बबा तिर जेन हर जाही मजा पाही। 


जड़ावत लोग जाड़ा मा बहुत हावँय। 

रजाई जे धरे लाही मजा पाही। 


लगे बरसात तब पानी अबड़ चूहे ।

जे छानी ला बने छाही मजा पाही।


समे मा काम निपटा के रहे आघू।

उही हर गीत ला गाही मजा पाही।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव

 छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन


1222 1222 1222


ददा दाई जियत हन तोर डर झन कर

अभी जॉंगर चलत हावय फिकर झन कर


बस अतके हे निवेदन तोर ले बेटा

जुआ सट्टा नशा मा मन जहर झन कर


खदर छानी रहिस अब छाय हन खपरा

बनय ता छत बनय वापस खदर झन कर


गरीबी मा दुबर हन देख पहिली ले

फुटानी मार दुब्बर ला दुबर झन कर


गुजरगे हे दिवस हफ्ता ले पखवरिया 

मजूरी दे अभी महिना बछर झन कर


न भटके हन न अटके अन बता देथन

रुपइयालाल तॅंय करिया नजर झन कर


पहुॅंच जाबो हमू सुख के दुवारी तक

सगा सुखदेव तॅंय लकरे-लकर झन कर


-सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर''

गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन


1222 1222 1222 

  

उमर ढल गे मगर हे जान अभी बाकी। 

बढ़ाये मूँछ दाढ़ी शान अभी बाकी। 


झड़े सब दाँत मुँह खाली मुड़ी टकला।

भले आँखी गये पर कान अभी बाकी। 


चपल डारे हवय भाँठा नदी नाला। 

गनीमत हे बचे गौठान अभी बाकी। 


गँवाये बेग लहुटा दिस भला मानुष।

भरोसा हे हवय ईमान अभी बाकी।


खवाये भोज हम सब ला बला के तँय। 

खतम नइ होय हावय पान अभी बाकी।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन


1222 1222 1222 

  

मया मा तोर पगलाये हवँव मँय हा।

बिना सोंचे इहाँ धाये हवँव मँय हा।


रहिस मुर्दा समझ लकड़ी चढ़े हँव मँय। 

नदी ला पार कर आये हवँव मँय हा।


समझ रस्सी चढ़े हँव साँप ला धर के। 

तभे तोला इहाँ पाये हवँव मँय हा।


भजन करहूँ सदा मँय राम के संगी। 

गड़ी तोरे कसम खाये हवँव मँय हा।


दरश होही हवय बिस्वास मोला जी। 

भजन बस राम के गाये हवँव मँय हा।


लिखे हँव राम के गुण ला रमायण मा। 

जिहाँ आदर्श दरसाये हवँव मँय हा।


सुने समझे उही जाने रमायण ला। 

हजारों प्रश्न सुलझाये हवँव मँय हा।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹

 🌹 *ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹


*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*


*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*


*1222 1222 1222*


सुघर गुण ला बताये मा बने लागे

बड़े घर ला दिखाये मा बने लागे।


सखी रे गीत गाना मा मजा नइहे

अपन दुखड़ा सुनाये मा बने लागे।


इहाँ संसार मा रौंदत चले मनखे

गिरे मन ला उठाये मा बने लागे।


गिरा झन फूल फल ला  मार के कोहा

पके बोइर हलाये मा बने लागे।


अहम के जी हुजूरी में लगय गुस्सा

मया बर खुद रिसाये मा बने लागे।


गुलामी के नशा मा नींद बड़ भाँजे

सुते मन ला जगाये मा बने लागे।


जगत माया ल अब्बड़ खुश करे आशा

कभू खुद ला रिझाये मा बने लागे।



आशा देशमुख

गजल

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