गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222
मया मा तोर पगलाये हवँव मँय हा।
बिना सोंचे इहाँ धाये हवँव मँय हा।
रहिस मुर्दा समझ लकड़ी चढ़े हँव मँय।
नदी ला पार कर आये हवँव मँय हा।
समझ रस्सी चढ़े हँव साँप ला धर के।
तभे तोला इहाँ पाये हवँव मँय हा।
भजन करहूँ सदा मँय राम के संगी।
गड़ी तोरे कसम खाये हवँव मँय हा।
दरश होही हवय बिस्वास मोला जी।
भजन बस राम के गाये हवँव मँय हा।
लिखे हँव राम के गुण ला रमायण मा।
जिहाँ आदर्श दरसाये हवँव मँय हा।
सुने समझे उही जाने रमायण ला।
हजारों प्रश्न सुलझाये हवँव मँय हा।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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