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Saturday, 1 August 2020

ग़ज़ल -मनीराम

ग़ज़ल -मनीराम

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212  212  212  212
रोज डॅट के कमा काम बनहीं तभे ।
घाम मा झन घमा काम बनही तभे।

थोक पाके घलो मन मा संतोष कर,
चाॅच झन तैं लमा काम बनही तभे।

खूब होथे नफा दान कर ले लहू,
पुन्य कर ले जमा काम बनही तभे।

सोज अॅगरी कहाॅ घी निकलथे बता,
थोरके तमतमा काम बनही तभे।

मंच हाबय सजे भीड़ हाबय घलो,
बाॅध दे तैं समा काम बनही तभे।

खात भटका हवस तैं कहाॅ ले कहाॅ,
राम ला‌ मन रमा काम बनही‌ तभे।

लक्ष्य मा ध्यान‌ दे चेत करके बने,
छोड़ सब डमडमा काम बनही तभे।

नइ बनय जान‌ ले माय मोसी करे,
काम सब ला थमा काम बनही तभे।

तैं पनकबे मनी चार आसीस ले,
जन हृदय मा अमा काम बनही तभे।

मनीराम साहू 'मितान'

गजल -दुर्गा शंकर इजारदार

गजल -दुर्गा शंकर इजारदार

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212

गाँव भर ला लड़ाई मतावत हवय,
शेखी सरपंच अँव कहि बघारत हवय।।

दूध बर लइका रोवत हे ग्वाला के घर,
सेठ के लइका हा खीर खावत हवय।।

गाय नौ लाख राखे के का फायदा,
जब दही बर घरो घर ललावत हवय।।

दुनिया आधुनिकता मे तो रंग गिस,
आज जुन्ना सबो हर नँदावत हवय।।

पीठ पीछू छुरी वो घुमत हे धरे,
मीठ आगू मा जो गोठियावत हवय।।

जीते जी बाप दाई ब डंडा धरे,
अउ मरे बाद गंगा नहावत हवय ।।

बात नेता के दुर्गा धरौ झन कभू,
वोट पाये के खातिर रिझावत हवय।।

दुर्गा शंकर ईजारदार
सारंगढ़ (छत्तीसगढ़)

गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम 
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212 212 212 212 

बन सिपाही कलम ज्ञान ला बाँट ले।
का गलत का सही बात ला छाँट ले।।

मेहनत के सदा मान होथे इँहा।
जोर जाँगर कमा ढेरा सुख आँट ले।।

चार दिन के जवानी पहा सुख धरे।
फिर बुढ़ापा पहाये हे दुख खाट ले।।

प्रेम बिरवा लगा छाँव सुख जन मिले।
काँटा कुमता गढ़े पाँव ना काट ले।।

एक मनखे सबो एक हे तो लहू।
भेद खाई बढ़े रात दिन पाट ले।।

गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

ग़ज़ल - मनीराम साहू मितान

ग़ज़ल - मनीराम साहू मितान

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212  212  212 212

जान ले झूठ मा सच कटावय नही।
पाट कतको समुन्दर पटावय नही।

हाॅ समझबे तभे ये हवय काम के,
ये गणित आय कब्भू रटावय नही।

ऊॅच छानी बनाबे बने सोच के,
खूब पाथे गरेरा खॅटावय नही।

भर बने मोर संगी धरम ताल ला,
पुन्य के जल कभू गा अॅटावय नही।

बात सच ये हवय झट बिसरथे सखा,
ज्ञान जब चार हित मा बॅटावय नही।

आ अभरके उहू पाॅव गड़ही कभू,
जेन काॅटा डगर के हटावय नही।

बात खच्चित हवय कष्ट पाथे नॅगत,
जेन‌ तिसना बढ़ाथे घटावय नही।

साध‌ ले एक ला सब सधाही मनी,
ज्ञान मिझरे ले झटकुन छॅटावय नही।

मनीराम साहू 'मितान'

ग़ज़ल--आशा देशमुख

ग़ज़ल--आशा देशमुख

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212  212  212 212

सौ भले हे बड़े पाँच भारी पड़े
ताम पीतल म हे काँच भारी पड़े।

झूठ बइठे तराजू म क्विंटल किलो
एक तिल के सहीं साँच भारी पड़े।

डालडा हा जमे सोझ निकले नही।
नानकुन अंगरा आँच भारी पड़े।

लाख रुपिया के जानव सुबे के हवा
बैद डॉक्टर दवा जाँच भारी पड़े।

रेल लोहा हवय लाद लोहा चलय
जाय पटरी उखड़ खाँच भारी पड़े



आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

ग़ज़ल--आशा देशमुख

ग़ज़ल--आशा देशमुख

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212  212  212 212

चोर चोरी करत खाँस भारी पड़े।
घाव तलवार ले फाँस भारी पड़े।

ये सही आय मुस्कान सुघ्घर लगय
पर विपत में खुशी हाँस भारी पड़े।

सोन चाँदी महल धन हवय तन सुघर
ये सबो चीज मा साँस भारी पड़े।

दिन बिताये रे सागौन के खेत मा
आख़री मा सखा बाँस भारी पड़े।

आय पहुना बनायेंव सोंहारी बरा
आज दारू नशा माँस भारी पड़े।


आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

छत्तीसगढ़ी गजल -जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"



छत्तीसगढ़ी गजल -जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम 
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212 212 212 212  

तैं बुरा अउ भला सबला जानत हवस।
फेर नइ बात कखरो रे मानत हवस।1

आन बर बड़ मया पलपलावत हवै।
देख दाई ददा तोप तानत हवस।।2

जाग गे सोय हा, आत हे खोय हा।
तैं डहर धर गलत खाक झानत हवस।3

मोल जानेस नइ तैं समय के कभू।
आग लगगे कुँवा तब रे खानत हवस।4

का करत हस करम तैं अपन देख ले।
सत मया मीत अउ रीत चानत हवस।5

बह जथे धार हा पथ बनाके खुदे।
रोक के धार नदियाँ उफानत हवस।6

आय हे जातरी खुद चपक झन नरी।
तैं दवा कहिके दारू ला लानत हवस।7

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा (छत्तीसगढ़)

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...