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Monday, 5 October 2020

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव

 छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव


बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम

 मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन


2212 2212


सबला पता ये माप हे

भुॅंइया ले भारी पाप हे


पापी बिना कहिदे भला

का पाप अपने-आप हे


तइहा ले देखत आत हन

सत्ता के मुॅंह चुपचाप हे


बेटा करा हे रेडचिफ

भुॅंभरा म उखरा बाप हे


आजो कुपरथा के डहर

अड़के खड़े सब खाप हे


सच के बड़ाई दूर तक

लबरा के एके धाप हे


सुखदेव अलखादे करस

बपुरा ॲंगूठा छाप हे


-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹

 🌹*ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

 

*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*

 *2212 2212*


हर चीज के बोली लगे

खतरा म अब डोली लगे।1


जनता सुतत हे चैन से

रखवार ला गोली लगे।2


लिपटे तिरंगा शान से

लाली तिलक होली लगे।3


सुन्ना मया बिन हे महल

सुख धाम दू खोली लगे।4


कतको भरे भंडार हा

खाली तभो झोली लगे।5


अब रस नही हे फाग मा

हुड़दंग के टोली लगे।6


सबले बड़े भगवान ले

दाई के ये ओली लगे।7


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 

मुस्तफ़इलुन   मुस्तफ़इलुन 

2212   2212 


हुसियार बन बोलत हवे। 

सब राज ला खोलत हवे। 


कइसे गरीबन के सबो। 

धन धान ला झोलत हवे। 


लड़की अकेला देख के। 

मन हा उँखर डोलत हवे। 


नीचा दिखाये बर कका। 

हर बात मा छोलत हवे। 


झगरा लड़ाये बर सदा। 

मन मा जहर घोलत हवे। 


हमरो कमाई रात दिन।

मुसुवा बने फोलत हवे।   


भौजी समझ हमला कका।

देवर असन ठोलत हवे।


रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 

मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन

2212   2212   


गिधवा लगाये घात हे।

ये पेट सब करवात हे।  


बघुवा शिकारी बन धरे। 

बकरी ल मारत खात हे।


पंछी बिहिनिया जाग के। 

भोजन तलासे जात हे। 


चांटी बटोरय रात दिन।  

दाना तभे सकलात हे। 


जाला बनाये मेकरा। 

कीरा अपन अरझात हे। 


मुसुवा धरे बर साँप हर।   

खुसरे बिला तब पात हे


बछरू मरे जब भूख ता। 

गइया तको पनहात हे। 


मिहनत करइया हर करे। 

कब देखथे की रात हे। 


हावय असन मनखे तको। 

बस लूटे बर धमकात हे। 


रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹

 🌹*ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

 

*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*

 *2212 2212*


संशोधित


हर चीज के बोली लगे

खतरा म अब डोली लगे।1


जनता सुतत हे चैन से

रखवार ला गोली लगे।2


लिपटे तिरंगा शान से

लाली तिलक होली लगे।3


सुन्ना मया बिन हे महल

सुख धाम दू खोली लगे।4


कतको भरे भंडार हा

खाली तभो झोली लगे।5


अब रस कहाँ हे फाग मा

हुड़दंग के टोली लगे।6


सबले बड़े भगवान ले

दाई के ये ओली लगे।7


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹


🌹*ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

 

*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*

 *2212 2212*



करथें नकल ला मूल कस।

लागे तभो ले भूल कस।


कतका इहाँ धन जोरबे

माया हवय गा धूल कस।


लकड़ी नहीं छेना नहीं

बरथे सिलेंडर चूल कस।


जिभिया उलावव सोच के

लागे कभू ये शूल कस।


तन बज्र जइसे हे लगे

रहिथे हृदय हा फूल कस।



आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 

मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन

2212   2212    


दुख हर जनावय जान ले।

सुख नइ गनावय जान ले। 


कतकोन तँय रूठे रबे।

ओ नइ मनावय जान ले। 


खेती करे के साध हे।

चिखला सनावय जान ले। 


तरिया खने कतको कहे।

डबरा खनावय जान ले। 


भाई करे बाँटा कभू।

रिस्ता चनावय जान ले। 


झगरा बढ़े घर द्वार मा।

परदा तनावय जान ले। 


जे शांति के दुश्मन रथे।

ओ बम बनावय जान ले। 


रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

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