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Friday, 1 January 2021

गजल-मनीराम साहू 'मितान'

 गजल-मनीराम साहू 'मितान'


बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 


भगाबो दूर अँधियारी सबो मिलके।

बढ़ाबो सच्च उजियारी सबो मिलके।


रहय झन‌ बीच मा काँकर हटाबो गा,

पटोबो हम सुघर तारी सबो मिलके।


सतावय झन‌ कभू कोनो हमर माँ ला,

करत रहिबो जी रखवारी सबो मिलके।


कठिन‌ नइ होय कारज‌ गा कभू कोनो,

करिन हम ओसरी पारी सबो मिलके।


अपन‌ घर द्वार पारा के सफाई कर,

भगाबो झार बीमारी सबो मिलके।


सुमत के साफ गंगा मा नहा‌ लेबो,

डुबकबो रोज सँगवारी सबो मिलके।


मनी के एक कोशिश‌ हे रहँय सब जुर,

धरँय गा बाट बढ़वारी सबो मिलके।


- मनीराम साहू 'मितान'

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन


1222 1222 1222 

 

गरीबी मा झुलस जाथे ये जिनगानी। 

कहाँ सुख चैन ला पाथे ये जिनगानी। 


न खाये के ठिकाना हे न कुरिया के। 

तभो आराम फरमाथे ये जिनगानी। 


कभू सूखा कभू जाड़ा जनावत हे। 

सबो मौसम ल अपनाथे ये जिनगानी। 


दुसर के शान शौकत देख जल जाथे।

गरीबी सोंच पछताथे ये जिनगानी। 


कहूँ मिल जाय धन दौलत अचानक से।

उड़ा के खूब इरताथे ये जिनगानी।


रचानाकार-दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम 

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 

1222  1222  1222  


नवा ये साल मा कुछ भी नवा नइ हे। 

करोना के अभी तक तो दवा नइ हे। 


बिहिनिया मा उही सूरज उही पानी। 

अभी भी देख ले ताजा हवा नइ हे। 


उही घर खाट कुरिया खोर अउ तरिया।  

बदल जय भाग मोरो रोठवा नइ हे।


डगर उरभट रहे कल तक हवय अब भी। 

कहूँ तँय रेंग रसता सोझवा नइ हे। 


लड़े कल आज अउ कल भी सगे भाई। 

सुधर जय लोग अतका जोजवा नइ हे। 


नवा हे मोर बर सच मा कलेंडर हर। 

लटक रहिथे मगर मुँह बोलवा नइ हे। 


कटावत हे अभी भी पेंड़ जंगल के। 

थमे टँगिया कहाँ जब भोथवा नइ हे। 


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम 

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 


1222  1222  1222

नदी के पार मा डेरा बनाये हँव। 

मनाये बर बहुत दुरिहा ले आये हँव। 


पहाड़ी डोंगरी जंगल नदी नरवा।

बहुत खोजे हवँव तोला त पाये हँव। 


बछर भर सुध तको बेसुध रहिस हावय। 

मिले तँय आज मोला तब नहाये हँव।


नदी आये रहे काली नहाये बर।  

अभी तँय आ जबे मँय सुध लमाये हँव। 


बिहा के लेगहूँ तोला अभी संगी। 

कका दाई ददा ला मँय बलाये हँव। 


बिना मँय तोर वापस घर कहाँ जाहूँ।

भले मरहूँ कसम मँय तोर खाये हँव। 


दया कर के मया कर ले गड़ी तँय हर।  

भरोसा तोर कर जिनगी बिताये हँव।

 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल-अरुण कुमार निगम

गजल-अरुण कुमार निगम


*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*


*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*


*1222 1222 1222*


हमर सँग नाच ले गा ले मजा आही

मया छइयाँ मा सुस्ता ले मजा आही।


धरम अउ जात ला झन पूछ मनखे के

गिरे हपटे ला अपना ले मजा आही।


बिना पीटे ढिंढोरा तोर मन अकुलाय

नरी मा ढोल लटका ले मजा आही।


दिखाना चाहथस तँय धौंस कुर्सी के

किसनहा मन ला गरिया ले मजा आही।


"अरुण" हर संग चलथे जी कबीरा के

तहूँ आ कान फुँकवा ले मजा आही। 


*अरुण कुमार निगम*

गज़ल- अजय अमृतांशु

 गज़ल- अजय अमृतांशु


*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*

*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन*

1222   1222    122


अपन पइसा ल गठिया के धरे कर।

हवय चोरी के डर थोरिक डरे कर।


घुमत ठलहा हवस काबर बताना,

कभू तो काम धंधा ला करे कर। 


ठिकाना नइ हे जिनगी के समझ ले,

कभू तो ककरो दुख पीरा हरे कर। 


सबो कोती लगे इरखा के आगी।

कभू ये आँच मा तैं झन जरे कर।


चरत हे देश ला नेता सबो मिलके।

तहूँ काबर चुपे हावस चरे कर।


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

Sunday, 27 December 2020

छत्तीसगढ़ी गजल-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 छत्तीसगढ़ी गजल-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे रमल मुसद्दस सालिम*

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन


*2122    2122    2122*


कुछ न कुछ करके दिखाना हे जरूरी।

फर्ज मनखे के निभाना हे जरूरी।1


राही के रूके के कोनो ठाँव कस नइ।

घर मया के अब बसाना हे जरूरी।2


सच मा अड़बड़ हे जरूरी खाना पीना।

फेर पी खाके पचाना हे जरूरी।3


काम मा कोनो विघन ले बचना हे ता।

राह ले रोड़ा  हटाना हे जरूरी।4


सात फेरा लेय भर मा होय नइ कुछु।

संग जीयत ले निभाना हे जरूरी।5


मेचका जइसे कुआँ मा खुसरे झन रह।

सब डहर मा आना जाना हे जरूरी।6


सब समय मा अँड़ना अउ लड़ना हे फोकट।

देख बेरा सिर झुकाना हे जरूरी।7


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...