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Saturday, 6 February 2021

ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*


*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*212 1212 1212 1212*


बड़ मतात हे गिधान मन बवाल देवता।

पाँख झट कतरके पिंजरा मा डाल देवता।


पथरा जइसे होगे मनखे पथरा बन तहूँ हवस।

हाल देख तैं जगत के अब तो हाल देवता।


मार काट होत हावे सोत हावे सत सुमत।

मनखे मन ला मनखे मन बनाय ढाल देवता।


टेक गे महल अटार गाँव गे शहर लहुट।

बाग बन कटाय अउ अँटाय ताल देवता।


झूठ बाढ़गे गजब अउ लूट बाढ़गे गजब।

चोर ढोर के नँगत के पो दे गाल देवता।


बात बानी हे जहर उठे विकार जस लहर।

लागथे अब आत हावे सबके काल देवता।


लाज राखे बर धरम के आबे के नही बता।

दे हुँकारू है हाँ नही मा हे सवाल देवता।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*


*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*212 1212 1212 1212*


अमरे बर अगास फोकटे अड़े हे तोर घर।

देखे भर मा नाम के गजब बड़े हे तोर घर।1


मोर घर हा नींद भाँजे रोज लात तान के।

एक पग मा चुरमुराय बस खड़े हे तोर घर।2


आघू मा दुवार अउ पिछोत बारी मोर हे।

साज सज्ज़ा बस दिखावटी जड़े हे तोर घर।3


मोर घर मा भाई बहिनी माँ ददा बबा हवै।

भूत बंगला असन रिता पड़े हे तोर घर।4


मोर घर कहाय झोपड़ी मकान घर ठिहा।

नाम धर महल अटार बस गड़े हे तोर घर।5


मोर घर दुवार मा फुले हे फूल बड़ अकन।

पान फूल एको ठन कहाँ झड़े हे तोर घर।6


पी घलो जहर ला मोर घर अमर हे देख ले।

दुःख डर दरद ले का कभू लड़े हे तोर घर।7



जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल- अजय अमृतांशु

 गजल- अजय अमृतांशु


बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिमफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212 212 212 


सब ले बढ़िया वो इंसान हे। 

दिल मा जेकर गा ईमान हे। 


देख भारत के सेना खड़े।

बैरी मन भारी हैरान हे। 


जेन लूटत हे मजबूर ला। 

सिरतो वोहा  हैवान हे। 


झन झुकय याद रख बात ला। 

ये तिरंगा हमर शान हे। 


साँच के संग देना हवय।

झूठ ला छोड़ पहिचान के।


अजय "अमृतांशु"

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

ग़ज़ल --आशा देशमुख*


*ग़ज़ल --आशा देशमुख*


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*


*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*212 1212 1212 1212*



सोन के चिरई उदास पंख हा कटात हे।

गीध के चिंया ला देख चोंच लफलफात हे।


काग बर सजाय थाल मोतियन रतन चुगे

मूंग मोठ छींत फेंक हंस ला खवात हे।


आज कल तो पूर्व मा भी पश्चिमी हवा चले

नाच गान मंच मा ये लाज हा उड़ात हे।


लाल लाल हे जमीन घाव हे हरा हरा

बैर के ये खेत मा मया अबड़ सुखात हे।


सात छेद हे तभो धरे हे राग बाँसुरी

एक ताल ढोल हा ढमक ढमक बजात हे।



आशा देशमुख

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़

फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन


212 1212 1212 1212 


देश ला अजाद जे कराये वो अमर रहे। 

जान दे के आन जे बचाये वो अमर रहे। 


वीर वो सपूत नाम दर्ज जिन कराय हे। 

नइ कराय जान पर गँवाये वो अमर रहे। 


सब गरीब ला उठाय बर विचार जे करे।

जेन संविधान ला बनाये वो अमर रहे। 


देश के सुरक्षा बर डटे रथे सबो पहर। 

सीमा मा सिपाही जेन जाये वो अमर रहे। 


भूख ला मिठाय बर गड़े रथे जे खेत मा। 

जे किसान अन्न ला उगाये वो अमर रहे।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़

फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन


212 1212 1212 1212 


बात-बात मा बड़े-बड़े निकलथे बात हर। 

बात जब खिंचाय बीत जाय पूरा रात हर। 


बात के बिना कभू बने न कोई बात जी। 

बात ला बिचार के कहव बढ़े न घात हर। 


बोलना हे बात ला समाज में त सोंच लव। 

जोश मा बिगड़ जथे त पर जथे ग लात हर। 


बात जब गरम रहे त दूर होना ठीक हे। 

मुँह तको जलाय देत हावे ज्यादा तात हर। 


जब उठे धुआँ-धुआँ समझ जवव जलत हवे। 

पेंड़ तक सहे नहीं झड़े लगे जी पात हर। 


खून सींच के कमाय तेन मन अघाय जी। 

जे रहे अलाल तेला नइ मिठाय भात हर। 


नर्म भाव रख जिये ले सुख सदा मिलत रथे। 

जेन हे घमंडी तेला नइ सहाय मात हर। 


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

Thursday, 4 February 2021

ग़ज़ल--जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 ग़ज़ल--जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे रमल मुसमन महज़ूफ़*


फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन


*2122 2122 2122 212*


आगाज से मतलब नही अंजाम चाही बने।

कुछ काम से मतलब नही परिणाम चाही बने।1


सूरज लुकाये रोज के गरमी घरी मा भले।

सरदी समय घर अंगना मा घाम चाही बने।2


देवय दरद दूसर ला बेपरवाह होके जौने।

पीरा भगाये बर उहू ला बाम चाही बने।3


बिन शोर अउ संदेश के तरसे घलो कान अब।

मन मा खुशी भर दै तिसन पैगाम चाही बने।4


आफत बुला झन रात दिन करके हटर हाय तैं।

जिनगी जिये बर जान ले आराम चाही बने।5


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...