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Saturday, 12 December 2020

गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी बहरे रमल मुरब्बा सालिम

 गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी 

बहरे रमल मुरब्बा सालिम

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122 2122


आँफिसर आराम खोजय

अउ व्यपारी दाम खोजय


रोज के मजदूर भाई

रोटी सेती काम खोजय


चापलूसी मनखे अब तो 

हर ठिहाँ मा नाम खोजय


चाहे बिहना हो सँझा बस 

दरुहा मनखे जाम खोजय


जाड़ कातिक पूस के तो 

रँउनिया के घाम खोजय


खुदके घर मा नून नइये

परके घर बादाम खोजय


कतको मन खोजत हे धन पद

'ज्ञानु' हा प्रभु राम खोजय


ज्ञानु

ग़ज़ल -आशा देशमुख* 🌹

 🌹 *ग़ज़ल -आशा देशमुख* 🌹


*बहरे रमल मुरब्बा सालिम*

*फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन*

*2122 2122*


माल खावत हे हकन के।

आय पइसा हा गबन के।1


खेत बारी बेच डारे

काय कीमत हे रतन के।2


ठोसहा ला फेंक आये

फोकला राखे जतन के।3


दूसरा बर जी हजूरी

पेट मारत हे अपन के।4


जीभ हे अँगरा सहीं अउ

बोल बोलत हे भजन के।5


विष घलो अमरित बने हे

कृष्ण मीरा के लगन के।6


बिन अगिन के राख होथे

छल कपट बैरी जलन के।7


घोर बिपदा आय नारी

लाँघ झन  रेखा लखन के।8


बन तहूँ हुशियार आशा

मान रख गुरुवर कथन के।9


आशा देशमुख

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

 गजल-दिलीप कुमार वर्मा 


बहरे रमल मुरब्बा सालिम 

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 


2122  2122 


देख सूरत डर हिं जाबे। 

फेर गलती कर हिं जाबे। 


पेंड़ के पत्ता बरोबर। 

पाक इकदिन झर हिं जाबे।


कब तलक लड़बे भला तँय।

हार के अब घर हिं जाबे। 


जब चिता तोला जलाही

काठ जइसे बर हिं जाबे।


राम भजले श्याम भजले।

एक दिन तँय तर हिं जाबे।


तोर दिल दरिया हवय ता।

बांध जइसे भर हिं जाबे।


लग जथे कीड़ा कसम से।

मीठ हस ता सर हिं जाबे।


रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

ग़ज़ल -आशा देशमुख* 🌹

 🌹 *ग़ज़ल -आशा देशमुख* 🌹


*बहरे रमल मुरब्बा सालिम*

*फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन*

*2122 2122*


घोषणा अब्बड़ करे हे।

जेब ला खुद के भरे हे।


फूँक के पीए मही ला

दूध मा जेहर जरे हे।


चित्र मा दिखथे बगीचा

जाय मा छेरी चरे हे।


आज मनखे रंग बदले

लाज मा टेटका मरे हे।


नीम के घर काम आगे

द्वार मा महुआ झरे हे।


ये चुनावी पेड़ मा जी

झूठ के वादा फरे हे।


रोय अब्बड़ अन्नपूर्णा

धान खुल्ला मा सरे हे।


आय मुसवा के तिजोरी

साँप हा चाबी धरे हे।


बाँचही का प्रेम आशा

सोच  के आँसू ढ़रे हे।



आशा देशमुख

गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी 


बहरे रमल मुरब्बा सालिम 

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122 2122


झूठ हा फूलत फलत हे

हाथ औ सच हा मलत हे


सच नवायें मूड़ रहिथे

बात अतके बस खलत हे


डरना का हे सच कहे बर 

जें गलत हे ता गलत हे


चलना नइये जें डगर मा

तभ्भो कतकोमन चलत हे


'ज्ञानु' आये हे शिकारी

आगू मा चारा डलत हे


ज्ञानु

गज़ल - अजय अमृतांशु

 गज़ल - अजय अमृतांशु


बहरे रमल मुरब्बा सालिम

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122 2122


मेहनत कर काम होही

जग म तोरो नाम होही।


नैया ओकर पार होथे,

मुँह म जेकर राम होही। 


नवतपा हे झन निकलबे।

चर चरावत घाम होही


पूजबे माँ बाप ला तब।

घर ह चारों धाम होही।


भीड़ हे बाजार मा बड़

आज लहुटत शाम होही।


गर बुरा करबे करम तँय 

तब बुरा अंजाम होही।


सेना बाढ़त सीमा कोती।

लागथे संग्राम होही।


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

गजल- दिलीप कुमार वर्मा बहरे रमल मुरब्बा सालिम

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुरब्बा सालिम 

फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन 


2122  2122    


आज मुखिया सार हावय।

शेर कस दमदार हावय।


देश खातिर मर मिटे बर। 

तन बदन तइयार हावय। 


चल चढ़ाई कर अभी तँय। 

लक्ष्य सीमा पार हावय। 


जोश हे मन मा भराये। 

बोल मा टंकार हावय। 


कह अभी धावा करे बर। 

मान बैरी हार हावय।  


बाँह फरकत हे लड़े बर। 

मूँछ तक मा धार हावय। 


लूट के लाबोन धरती। 

जेन खातिर रार हावय।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल

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