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Friday, 8 January 2021

गजल-मनीराम साहू 'मितान'

 गजल-मनीराम साहू 'मितान'


बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212


सजाय खूब देह हे हृदय हवय कबाड़ गा।

भुले हवय मया पिरित करत अपन बिगाड़ गा।


धुआँ धुआँ दिखत हवय जहर भरे हवय पवन,

करय जी चेत कोन अब हवय सबो जुगाड़ मा।


लकर धकर रथे सदा सबर कहाँ हे कोन ला,

अपन‌ बनत हवय कहूँ त तिल बनाँय ताड़ गा।


बदल‌ गइँन सबो इहाँ समे अपन‌ भुलाँय हे,

डराय पूस मास मा लुकाय देख जाड़ गा।


बने सबो हे देख लव मनुज सबन‌ के ग्रास जी,

नदी पहाड़ खेत सब तलाब पेड़‌ झाड़ गा।


बढ़ात द्वेश खूब हें लड़त हवँय जी ताज बर,

बने जे लोकतंत्र घर करत हवँय उजाड़ गा।


चलाय टाँगी पाँव मा मुरुख हवय मितान हा,

बुता चिटिक करय नही भले रहय असाड़ गा।


- मनीराम साहू 'मितान'

गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

 गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*

*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*

*1212 1212 1212 1212*


कहाँ दिखत हे रोजगार देश जन विकास हा।

मरत हे आम जनता अउ बढ़त हे भूख प्यास हा।


सजे हे राजनीति मंच चमचा अउ दलाल के

करे गुलामी चाटुकार अंधभक्त दास हा।


कहाँ ले राम राज के खुवाब पूरा होय जी

फँसे गला जिहाँ हे जाति पाति धर्म फाँस हा।


युवा किसान दीन अउ गरीब के पुकार हे

मिले सबो ला रोटी सुख मिटे जुलुम के त्रास हा।


रखौ सुमत समानता ला गोठ सत्यबोध के

मिटे कभू ना काकरो बसे मया के आस हा।



इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

गजल- अजय अमृतांशु

 गजल- अजय अमृतांशु


*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*

फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22


सोंचे समझे बिना तैं बात ल झन बोले कर ।

राज दिल के सबो ककरो करा झन खोले कर।


रिश्ता होथे बड़े अनमोल बने रख येला।

नोट मा रिश्ता नता टूटे हे झन तोले कर। 


आय बरसात अबड़ मछरी चढ़े नरवा मा।

जाय कर नदिया डहर तरिया मा झन झोले कर।


देश हिंसा म जरत हे लगे आगी घर घर।

तैं जहर जात धरम बात के झन घोले कर। 


तै बड़े आदमी होबे भले मोला का हे।

सोंच के बोल बने कोनो ला झन ठोले कर।


अजय अमृतांशु

भाटापारा ( छत्तीसगढ़)

ग़ज़ल -आशा देशमुख*

 *ग़ज़ल -आशा देशमुख*


*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*


*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*1212 1212 1212 1212*


बसे बसाय गाँव छोड़ के चले कमाय बर

मया तियाग के चले हे देवता मनाय बर।


अहम धरे लजन हवय लड़ात हे इहाँ उहाँ

जहर भराय मीठ बोल आग ला लगाय बर।


दिखात शान हे अबड़ नही हे घर म फोकला

उधार के सबो जिनीस जिंदगी चलाय बर।


कभू दया धरम धरे नही कभू रखे मया

सनाय हाथ खून जाय तीर्थ मा नहाय बर।


भराय ला भरत हवे ग राज पाट झूठ के

गिरे पड़े हवे गरीब कोन हे उठाय बर।


आशा देशमुख

Thursday, 7 January 2021

गजल-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 गजल-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*


*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*1212 1212 1212 1212*


चलत रथस तने तने, धरा के बोझ बन झने।

अपन बुता ला कर बने, धरा के बोझ बन झने।1


कभू न पेड़ पात ला लगाय बर गतर चले।

करत रथस खने खने, धरा के बोझ बन झने।2


दया मया सबे बरो के इरसा द्वेष रंग मा।

दिखत हवस सने सने, धरा के बोझ बन झने।3


अपन करम ला भूल के, दुसर बुराई ला सदा।

चलत रथस गने गने, धरा के बोझ बन झने।4


अपन के तैं बड़ाई बर, दुसर के सँग लड़ाई बर।

रथस सदा ठने ठने, धरा के बोझ बन झने।5


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम 

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 


1222  1222  1222

नदी के पार मा डेरा बनाये हँव। 

मनाये बर बहुत दुरिहा ले आये हँव। 


पहाड़ी डोंगरी जंगल नदी नरवा।

बहुत खोजे हवँव तोला त पाये हँव। 


बछर भर सुध तको बेसुध रहिस हावय। 

मिले तँय आज मोला तब नहाये हँव।


नदी आये रहे काली नहाये बर।  

अभी तँय आ जबे मँय सुध लमाये हँव। 


बिहा के लेगहूँ तोला अभी संगी। 

कका दाई ददा ला मँय बलाये हँव। 


बिना मँय तोर वापस घर कहाँ जाहूँ।

भले मरहूँ कसम मँय तोर खाये हँव। 


दया कर के मया कर ले गड़ी तँय हर।  

भरोसा तोर कर जिनगी बिताये हँव।

 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल-अरुण कुमार निगम

गजल-अरुण कुमार निगम


*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*


*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*


*2122 1122 1122 22*


तोर सरकार हवै तोर कहाँ गिनती हे

तोर तकदीर म राहेर नहीं कुल्थी हे।


वोट बर तोर दुवारी मा दिखाथे चेहरा

भारी मिठलबरा दगाबाज बड़े कपटी हे।


सात छेदा के दरद धर के अपन छाती मा

गीत गा-गा के सुनाथे वो सुघर बँसरी हे।


खोल आँखी ल चलव जान तभे पाहू तुम

कोन असली हे इहाँ, कोन इहाँ नकली हे।


उन्ना हउँला ह छलकथे रे "अरुण" समझे कर 

बूँद तक छलके नहीं तेन भरे गगरी हे


*अरुण कुमार निगम*


ये बहर मा फिल्मी गाना - 


जाने क्या ढूँढती रहती है ये आँखें मुझमें

जिंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है। 

दिल ने फिर याद किया बर्क-सी लहराई है।

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...