Total Pageviews

Thursday, 7 January 2021

गजल-अरुण कुमार निगम

गजल-अरुण कुमार निगम


*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*


*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*


*2122 1122 1122 22*


तोर सरकार हवै तोर कहाँ गिनती हे

तोर तकदीर म राहेर नहीं कुल्थी हे।


वोट बर तोर दुवारी मा दिखाथे चेहरा

भारी मिठलबरा दगाबाज बड़े कपटी हे।


सात छेदा के दरद धर के अपन छाती मा

गीत गा-गा के सुनाथे वो सुघर बँसरी हे।


खोल आँखी ल चलव जान तभे पाहू तुम

कोन असली हे इहाँ, कोन इहाँ नकली हे।


उन्ना हउँला ह छलकथे रे "अरुण" समझे कर 

बूँद तक छलके नहीं तेन भरे गगरी हे


*अरुण कुमार निगम*


ये बहर मा फिल्मी गाना - 


जाने क्या ढूँढती रहती है ये आँखें मुझमें

जिंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है। 

दिल ने फिर याद किया बर्क-सी लहराई है।

No comments:

Post a Comment

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...