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Saturday, 30 January 2021

ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*


*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*212 1212 1212 1212*


धरके धीर जे चले ते मनखे धीर हे कहाँ।

देश बर जे मर मिटे ते शूर वीर हे कहाँ।1


साधु रूप धर दनुज किवाड़ खटखटात हे।

सीता छटपटात हे लखन लकीर हे कहाँ।2


तोर मोर फेर मा वतन के बारा हाल हे।

माता भारती के तन बदन मा चीर हे कहाँ।3


हन गियानी कहिके मनखे लोक लाज बेच दिस।

बेच दिस दया मया बचे जमीर हे कहाँ।4


धन खजाना के घमंड मा मरत हे आदमी।

मीत सत मया दया हा मनखे तीर हे कहाँ।5


जेती देख तेती बस जहर के बरसा होत हे।

सबके जे गला मा उतरे मीठ खीर हे कहाँ।6


जीव शिव हा तंग हे मनुष गजब मतंग हे।

मंद पीये मांस खाये नीर छीर हे कहाँ।7


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

ग़ज़ल --आशा देशमुख*

 *ग़ज़ल --आशा देशमुख*


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*


*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*212 1212 1212 1212*


भाव के उफान मा ये डायरी भरत हवे।

दुख दरद हँसी खुशी हृदय तरी झरत हवे।


जेन काठ भीतरी हमाय हे घुना करत।

चूल के धधक धधक ये आग मा जरत हवे।


गाय भैंस नइ रखे नंदात जाय कोटना

गाँव के सुमत मया ल कोन हा चरत हवे।


लोभ मोह बाढ़गे जमाय पाँव रोग हा

दूर होत हे नता  सगा पना ढरत हवे।


खेत खार हे अबड़ तभो जिये गरीब कस

लोभ कोचिया अपन ही जेब ला भरत हवे।



आशा देशमुख

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़

फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन


212 1212 1212 1212  


जाड़ बाढ़ गे हवे बता नहाये जाय बर। 

का जरूरी हे कका नहाना भी ह खाय बर?


छोड़ के रजाई जाना हर तको न भात हे। 

जान बूझ के मरे ल जाय का नहाय बर। 


हाथ गोड़ काँपथे सुने कका ये जाड़ के।  

कोन हर बनाये जाड़ ला भला सताय बर। 


दिन घलो निकल जथे फुसुर-फुसुर रुके नही। 

ये सुरुज तको बने न आय जी तपाय बर। 


दिन बिताव शॉल ओढ़ भुर्री ताप के भले। 

रात लाद कतको कम हे जाड़ ला भगाय बर।


मुँह तको धुले नही उठे नही हे खाट ले।

रात के पहात ही लड़े बिहानी चाय बर। 


घुरघुरासी लागथे नहाय बस के नाम ले। 

पर रथे तियार मन ह आनी बानी खाय बर।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

Friday, 29 January 2021

ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम*


*फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन*


*212 1222 212 1222*


मोह के गरी मा मन ला कभू लहन झन दे।

सत मया के मंदिर मा झूठ छल रहन झन दे।1


चाल हा रही बढ़िया हाल ता रही बढ़िया।

काम कर गलत कोनो ला कुछू कहन झन दे।2


कीमती हे पानी पानी हरे जी जिनगानी।

फोकटे कहूँ कोती भी कभू बहन झन दे।3


वीर बनके चलते जा धीर बनके चलते जा।

अति घलो जिया ला जादा कभू सहन झन दे।4


आग राग इरसा के भभके चारो कोती बड़।

मीत मत मया के मीनार ला दहन झन दे।5


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 ग़ज़ल - जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*


*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*212 1212 1212 1212*


प्यार रंग मा सने फिरत हवस बही बने।

बाप माँ ला भूल गेस कोन ता कही बने।1


ध्यान ला जमा के रख गियान गुण कमा के रख।

लेवना तथे निकलथे दूध जब दही बने।2


मनखे मनके सोच ला समझ सके कहूँ नही।

सबके सब हवे गलत ता कोन हे सही बने।3


हंस के सुभाव देख हाँसथे सबे इहाँ।

कोकड़ा के भेष धर गरी सदा लही बने।4


हाँ नही कहत रहव ग देख ताक के समय।

हर जघा न हाँ बने न हर जघा नही बने।5


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे हजज़ मुसमन अख़रब मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ महज़ूफ़*

 

*मफ़ऊल मुफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ऊलुन*


*221 1221 1221 122*


पथरा के जिया मोम कभू होय नही का।

अंतस हा बता तोर कभू रोय नही का।1


काटे चिरे के काम करत रोज हे मनखे।

भगवान घलो मन मा मया मोय नही का।2


तैं चील असन आँखी गड़ा रोज डराथस।

थक तोर घलो नैन कभू  सोय नही का।3


मन हा कहूँ हे करिया करे काय ता तरिया।

मन मैल ला सतसंग घलो धोय नही का।4


दाना घलो नइ होय तभो करथे किसानी।

थक हार कमइया हा गहूँ बोय नही का।5


नित डाँटथे फटकारथे बेटा ला बरजथे।

रिस बाँध के रोटी बता माँ पोय नही का।6


कोनो ला कहे कुछ ना मनाये कभू दुख ना।

परिवार के बोझा ला ददा ढोय नही का।7


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे हजज़ मुसमन अख़रब मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ महज़ूफ़*

 

*मफ़ऊल मुफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ऊलुन*


*221 1221 1221 122*


सुख चैन सबो तोर सखा भंग हो जाही।

का आन खुदे से घलो यदि जंग हो जाही।


बन पुरवा बसंती कहूँ बन बाग नचाबे।

बेरंग पड़े जिनगी हा सतरंग हो जाही।


चलबे बने पथ मीत मया सत धरे सबदिन।

डर दुःख दरद तोर निचट तंग हो जाही।


कोठी मा रतन धन रही अउ बाँह मा ताकत।

ता बैरी जमाना घलो हा संग हो जाही।


सब बर मया धरके बढ़े चलबे सबे दिन तैं।

दुश्मन घलो हा देख तोला दंग हो जाही।


चंगा रही तनमन तभे देवारी चमकही।

होरी मा सराबोर सरी अंग हो जाही।


जब घेर लिही गम हा डराही नही मन हा।

गमगीन जिया मा घलो तब उमंग हो जाही।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल

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