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Friday, 4 December 2020

ग़ज़ल --आशा देशमुख*

 *ग़ज़ल --आशा देशमुख*


*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*


*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*


*2212 2212 2212*


डबरी छिंचावत हे सुने हँव चल सगा

मछरी पकावत  हे सुने हँव चल सगा।


दिनरात मुँहटा मा कुकुर बइठे रहय

गइया बँधावत हे सुने हँव चल सगा।


खेती भरोसा मा जिये दाई ददा

बेटा बुलावत हे सुने हव चल सगा।


देखे हिरक के नइ कभू वो आजतक

पीढ़ा मढ़ावत हे सुने हँव चल सगा।


गाड़ी धरे अउ जाय ब्यूटी पार्लर

चूल्हा जलावत हे सुने हँव चल सगा।


कँउवा ल मिलगे नौकरी दरबार मा

गाना सुनावत हे सुने हँव चल सगा।


चंदा सुरुज पानी हवा हा नइ बँटय

आशा जगावत हे सुने हँव चल सगा।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

गजल- अजय अमृतांशु

 गजल- अजय अमृतांशु


बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन


2212  2212  2212


घर ले निकल झन बेटा तैंहा घाम हे। 

गरमी परत भारी जरत अब चाम हे।


आके चले गय कतको मनखे मन इहाँ।

सेवा करिन दुःखी के वोकर नाम हे।


कुछु नइ करय घूमत हे खाली पीली जे।

देखाथे अइसे मानो भारी काम हे।


बारात आघू नइ बढ़त हे देख तो।

नाचत हे भारी हाइवे हा जाम हे। 


अब दोगला हे ये जमाना जान ले। 

बाखा म रहिथे छूरी मुँह मा राम हे। 


रोवाथे सिरतो गोंदली भारी कहँव। 

बैपारी के कालाबजारी आम हे। 


भुगतत हवय खटिया म देखव वो परे।

करनी हवय जइसन उही परिणाम हे ।


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

गजल- मनीराम साहू

 गजल- मनीराम साहू 


बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन


2212 2212 2212


अड़बड़ करत हे घात चिटको ध्यान‌ दव।

चिमनी धुवाँ दिन‌ रात चिटको ध्यान‌ दव।


बाढ़त हवय बड़ रोग ऋतु मा जाड़ के,

सब खाव‌ ताते तात चिटको ध्यान‌ दव।


होथे नफा तन ला करे ले योग के,

सच सार हे ये बात चिटको ध्यान‌ दव।


मिहनत अबड़ लगथे फसल‌ उपजाय बर,

फेकव‌ न रोटी भात चिटको ध्यान‌ दव।


हे बड़‌ जरूरी गा सफाई सँग रखव,

हप्ता के दिन‌ जी सात चिटको ध्यान‌ दव।


शेखी बघारे नइ मिलय कुछ जान लव

तुम झन भुलव अवकात चिटको ध्यान‌ दव।


हे गोठ खाँटी सुन‌ मनी सउँहे सरग,

हाबय चरन पितु मात चिटको ध्यान‌ दव।


- मनीराम साहू 'मितान'

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव

 छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव


बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम 

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन 


2212  2212  2212  


सुलहारही गर मा गरी अरझात ला

पतियाव झन परलोखिया के बात ला


पाछू लबेदा मार कसके झोरही 

पहिली फरे-फर टोरही अमरात ला


सरकारी सथरा आय जादा सोच झन

पानी मिला बासी बनाले भात ला


बिश्वास कर जोनी जनम सब एक हे

काबर छुपाथस यार मनखे जात ला


कब तक हुॅंकारू भर हलाबे मुड़ अपन

कुछ तो बढ़ा 'सुखदेव' निज औकात ला


                 -सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर''

गजल- मनीराम साहू

 गजल- मनीराम साहू 


बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम


मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन


2212 2212 2212


बइठे हवय वो थापना हे नाम के।

नइहे ठिकाना एकठन जी काम के।


हाँ घूस के हावय जमाना आज कल,

होवय नही कुछ काम हा बिन दाम के।


हावय बतावत काम कतका हे करे,

धर धार निकलत हे पछीना चाम के।


पानी रहे बस होय नइ कुछ जान‌ ले,

नइ पोठ होवय गा फसल‌ बिन घाम के।


बरसात पानी बहि जथे जी फोकटे,

हावय भलाई राख लव‌ कुछ थाम के।


होथे नफा पानी पिये मा जान‌ ले,

भर के रखे जे रात लोटा ताम के।


भव ले तरे बर हे मनी तैं जाप कर,

सबले सरल हे नाम हा श्री राम के।


  - मनीराम साहू 'मितान'

Sunday, 29 November 2020

ग़ज़ल --आशा देशमुख*

 *ग़ज़ल --आशा देशमुख*


*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*


*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*


*2212 2212 2212*


संशोधित


परिवार अउ संस्कार हा अनमोल हे।

काला बताबे आजकल बड़ झोल हे।


कैसे बढ़त हे लोग के बी पी शुगर

मुंह मा करेला नीम कस तो बोल हे।


नापत हवच आकाश धरती ला गियाँ

आबे लहुट के फेर दुनिया गोल हे।


मोहात हे मन  दूर के आवाज मा

आ तीर मा बाजत हवय ये ढोल हे।


कुरसी भले दिखथे अबड़ मजबूत कस

आ देख खाल्हे मा अबड़ जन खोल हे।


होगे हवँय कोंदा इहाँ दू पक्ष मन

झन बीच आ बइहा रे मन बड़ पोल हे।


शरबत समझ के झन तो कुछु आशा गटक

पानी तरी मा भी जहर के घोल हे।



आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

गजल-चोवाराम वर्मा बादल

 गजल-चोवाराम वर्मा बादल


*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*


*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*


*2212 2212 2212*


 सुख दु:ख हे सबके लिखाये भाग मा

देथे परीक्षा सोन गल के आग मा


संगीत हा इंसान बर वरदान हे

होथे उदासी दूर सुनके राग मा


हे खजाना भोग सब्बो रोग के

अउ शांति मिलथे कामना के त्याग मा


काँटा तको हाबय जरूरी लागथे

रक्षा करे बर फूल के जी बाग मा


नाता बड़े होथे सबो ले प्रेम के

केशव अघा जाथे ग भाजी साग मा


हे देश के कानून मा ये खासियत

वो बाँध लेथे एकता के पाग मा


'बादल' रथे मीठा बचन मा रस अबड़

होथे फरक ये कोइली अउ काग मा



चोवा राम 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...