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Sunday, 10 January 2021

ग़ज़ल -आशा देशमुख*

 *ग़ज़ल -आशा देशमुख*


*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*


*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*1212 1212 1212 1212*


बसे बसाय गाँव छोड़ के चले कमाय बर

मया तियाग के चले हे देवता मनाय बर।


अहम धरे जलन हवय लड़ात हे इहाँ उहाँ

जहर भराय मीठ बोल आग ला लगाय बर।


दिखात शान हे अबड़ नही हे घर म फोकला

उधार के सबो जिनीस जिंदगी चलाय बर।


कभू दया धरम धरे नही कभू रखे मया

सनाय हाथ खून जाय तीर्थ मा नहाय बर।


भराय ला भरत हवे ग राज पाट झूठ के

गिरे पड़े हवे गरीब कोन हे उठाय बर।


आशा देशमुख

Saturday, 9 January 2021

गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*


*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*


*1222 1222 1222*


झुले नइ कान में बाला सहीं काबर।

गला मा नइ हवे माला सहीं काबर।


उड़न दे पाँख फैलाके जगाके आस।

मया ला रोकथस ताला सहीं काबर।


जिया ला जीत गुरतुर बात तैं कहिके।

जिया ला  गोभथस भाला सहीं काबर।


बढ़े बाँटे मया ये जानथन तभ्भो।

मया ला बाँटथस लाला सहीं काबर।


पियासे के बुझावत प्यास बढ चल तैं।

नदी होके रथस नाला सहीं काबर।


हरे कहिथस अटारी पोगरी तोरे।

ठिहा मोरे धरमशाला सहीं काबर।


हरँव छत्तीगढ़िया मैं सबे ले अँव रे बढ़िया मैं।

बुनत रहिथस भरम जाला सहीं काबर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 8 January 2021

गज़ल- जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया" बहरे रमल मुसम्मन सालिम

 गज़ल- जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बहरे रमल मुसम्मन सालिम 

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन 

2122 2122 2122 2122


बात मा बूता बने ता, तोप ताने कर कभू झन।

पर ठिहा ला बारे बर, बारूद लाने कर कभू झन।1


काम करथस रीस धरके, रेंगथस खुद तैं टमर के।

पर बिगाड़ा होही कहिके, खाई खाने कर कभू झन।2


जानथस खुद के ठिकाना, कोन कोती हावे जाना।

फोकटे परबुध मा उलझे खाक छाने कर कभू झन।3


घाव तन के भर जथे पर, नइ भरे मन के लगे हा।

बात करुहा बोल जिवरा, कखरो चाने कर कभू झन।4


का भरोसा दे दिही कब कोन मनखे तोला धोखा।

भेद अंतस भीतरी के खोल आने कर कभू झन।5


ओनहा कपड़ा असन सब छूट जाथे मैल तन के।

मैल मन के जाय नइ तैं, मन ला साने कर कभू झन।6


धूल धुँगिया के असन तो रोज के अफवाह उड़थे।

आँखी मा देखे बिना कुछु बात माने कर कभू झन।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




गजल- मनीराम साहू 'मितान'

 गजल- मनीराम साहू 'मितान'


बहरे रमल मुसम्मन मखबून महजूफ़

फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन 

2122 1122 1122 22


करले तैं आज अपन‌ काम समे भागत हे।

भजले तैं नाम सिया राम समे भागत हे।


फाँस बगराय हवे देख अबड़ चारों कुत,

कालनेमी मैं करत शाम समे भागत हे।


झन‌ डराबे गा कभू डँट के करे मिहनत ले,

आ तिपो ले गा अपन चाम समे भागत हे।


बड़ करे हावे जतन‌ गा ददा दाई तोरे

पूज ले गा तें चरन धाम समे भागत हे।


आय नइ काम चिटिक तोर अपन‌ कोनो हा,

दुख बढ़ा झन तें अबड़ लाम समे भागत हे।


पाय हाबस जी मया प्रेम नँगत के सबले,

दे मया ला तें चुको दाम समे भागत हे।


चल‌ धरे बाट ला तैं सत्य के सुख पाबे गा,

कर मनी तें हा अपन नाम समे भागत हे।


- मनीराम साहू 'मितान'

गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

 गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*

*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*

*1212 1212 1212 1212*


उठा नजर ला देख ले कहाँ रमे धियान हा।

लगे हे आग जाति धर्म नित जलत मकान हा।


गिरे परे उठा चले मसीहा अब वो हे कहाँ

लगे हे दाँव जिंदगी अधर मा हे परान हा।


बिरान हे गली बगीचा गाँव घर सबो जगा

मिले नही सुने ला मीठ कोयली के तान हा।


उठा कलम सदा सही दिशा धरे नियाव के

तभे पढ़े लिखे के मोल सार गुरु के ज्ञान हा।


कहे हे बात सत्यबोध थाम राह नेक जी

तभो ले भैरा हे पड़े सबो के आज कान हा।



इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

 गजल-दिलीप कुमार वर्मा


बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन


1212 1212 1212 1212


ददा कका बबा सबो रखे हवे ग आस हे। 

टुरी दिखाय जेन ला कहे टुरा कि पास हे। 


तलास मा खपत हवय शरीर हा सियान के।

उमर बढ़े बहुत हवय मिले नही हताश हे। 


टुरा मगर कहाँ कहे रखे हवय जे चाह ला। 

बताय कब करीना अस टुरी मिले त रास हे। 


जवान के विचार ला बबा कहाँ समझ सके। 

बिहाय दिस हवय तहाँ टुरा बहुत उदास हे। 


हवे ग फूल एक ठन  हजार भौरा आय हे। 

लड़े मरे अगर कहूँ समझ तहाँ विनाश हे।  


रहे जे भाग मा मिले उदास हो लड़व नही। 

सँवार लव ये जिंदगी समझ जहू का खास हे। 


लगे भले पहाड़ कस कभू-कभू ये जिंदगी।  

'दिलीप' चल बिना रुके कहाँ पहाड़ उचास हे।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल-मनीराम साहू 'मितान'

 गजल-मनीराम साहू 'मितान'


बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212


सजाय खूब देह हे हृदय हवय कबाड़ गा।

भुले हवय मया पिरित करत अपन बिगाड़ गा।


धुआँ धुआँ दिखत हवय जहर भरे हवय पवन,

करय जी चेत कोन अब हवय सबो जुगाड़ मा।


लकर धकर रथे सदा सबर कहाँ हे कोन ला,

अपन‌ बनत हवय कहूँ त तिल बनाँय ताड़ गा।


बदल‌ गइँन सबो इहाँ समे अपन‌ भुलाँय हे,

डराय पूस मास मा लुकाय देख जाड़ गा।


बने सबो हे देख लव मनुज सबन‌ के ग्रास जी,

नदी पहाड़ खेत सब तलाब पेड़‌ झाड़ गा।


बढ़ात द्वेश खूब हें लड़त हवँय जी ताज बर,

बने जे लोकतंत्र घर करत हवँय उजाड़ गा।


चलाय टाँगी पाँव मा मुरुख हवय मितान हा,

बुता चिटिक करय नही भले रहय असाड़ गा।


- मनीराम साहू 'मितान'

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...