Total Pageviews

Monday, 4 May 2020

ग़ज़ल--चोवा राम 'बादल ' बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम

ग़ज़ल--चोवा राम 'बादल '

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

122  122  122  122

उपर मा  उठाके  पटकथे अबड़ वो
 कभू दान देके झटकथे अबड़ वो

  फँसे जाल मा मनचला के वो तितली
  कहाँ के कहाँ तो भटकथे अबड़ वो

  तिली नइ लुए तैं करे चेत संगी
अजी देख लेबे चटकथे अबड़ वो

 निंदे तैं नहीं मन के साँवा बदौरी
मरे के बखत मा खटकथे अबड़ वो

नदी हावे साँकुर छलक जाथे पानी
  गिरे एको सरवर मटकथे अबड़ वो

 बताथे  सबो ला जहर होथे दारू
लुका के उही ला गटकथे अबड़ वो

बनत काम ला आन के जे बिगाड़य
  समे आथे 'बादल' अटकथे अबड़ वो

गजलकार---चोवा राम 'बादल'
हथबंद
बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

ग़ज़ल-आशा देशमुख बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम

ग़ज़ल-आशा देशमुख
बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122

जियाए नता ला जी महुरा गटक के।
चले सोज रद्दा गा रद्दा भटक के।

भरे हे खचाखच नही सीट खाली
बुलाये समे हा त जावय लटक के।

लदे डार आमा भरे हे बगीचा
तभो बेंदरा मन हा खाये झटक के।

न आगी दिखत हे न बिजली के खंभा।
जलन मा ये मनखे मरत हे चटक के।

अबड़ दान के मार शेखी बघारत
भरे भीड़ मा भीख देवय फटक के।

सुवारथ भरे हे करत हे दिखावा
सभा शोक मा देख रेंगय मटक के।

बली होय बैरी तभो झन डरावव
अपन बल दिखादे तें पउँरी पटक के।

हवा आय भारी बुझे वंश दीया
जिहाँ लाय नारी के चूँदी हटक के।

अबड़ डींग हाँके धरे नाम ज्ञानी।
सभा मा बुलाये त बोलय अटक के।

कलेचुप बइठव चढ़े हव अगासा
सितारा घलो तो गिरे हे छटक के।

करत हे सवारी सजे पालकी रथ
हूँमेलत हे भैंसा ले जाये पटक के।


आशा देशमुख

छत्तीसगढ़ गज़ल-सुखदेव

छत्तीसगढ़ गज़ल-सुखदेव

122 122 122 122

तहीं ईस अल्ला खुदा राम रब तँय
बताबे भला ये मनूजन ल कब तँय

लहुट के निहारय जवइया ह तोला
ओ पुन्नी के चंदा सहीं रोज फब तँय

परीक्षा भयंकर कठिन हे  रहन दे
बतादे समय ला हवच खास जब तँय

दबत हस त इस्प्रिंग जइसे भले दब
सगा राख माटी बरोबर न दब तँय

अलाली न कर भाई सुखदेव तँय हा
सिखइया गुरू हे अभी सीख सब तँय

-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

गजल- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम

गजल- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
  122     122      122     122

बिना मान देये कहाँ मान पाबे ।
बिना गुरु लखाये कहाँ ज्ञान पाबे ।।

समाये रही द्वेष मन भीतरी ता ।
सुमत भोर ला तैं कहाँ लान पाबे ।।

शरण धाम चारो ददा दाई गुरु के ।
जपे देव पथरा कहाँ ध्यान पाबे ।।

धरे राह तैं झूठ के तो कहूँ जी ।
बता फेर सीना कहाँ तान पाबे ।।

करौ दीन दुखिया के सेवा सदा जी ।
बड़े येखरे ले कहाँ दान पाबे ।।

धरे राह संगत बुराई चले तँय ।
भलाई मरम ला कहाँ जान पाबे ।।

गजानंद जग आज अँधरा बने हे ।
वचन सत्य खातिर कहाँ ठान पाबे ।।

गजलकार - इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

बड़े के कहे मान गंगा नहाले।
तरे जिंदगी जान गंगा नहाले।

बटोरत रहे जिंदगी भर खजाना। 
समे आय कर दान गंगा नहाले।

चलत राह राही थिरा ले तनिक जी।
भजन के करत पान गंगा नहाले।

कहाँ धाम चारो भटकबे कका तँय।
बबा के रखे ध्यान गंगा नहा ले।

पढ़े जा पढ़े जा ये जिनगी गढ़े जा।
त डुबकी लगा ज्ञान गंगा नहाले।

चढ़े चार काँधा चले जब मुसाफिर।
सँगे जाय शमसान गंगा नहाले।

धरम के डगर मा करत काम नेकी।
बना अपनो पहिचान गंगा नहाले।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गज़ल-अजय अमृतांसु

गज़ल-अजय अमृतांसु

बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

अरकान -122  122  122 122

कथा राम वैदेही संसार मा हे।
तभो झगरा सब जात परिवार मा हे।

चलाथौं बने कहिके बइठाये मोला।
नवा डोंगहा नाव मँझधार मा है।

करे कुछ नहीं देश के सेती तैंहा।
जवानी हवै फेर बेकार मा हे।

मया मा कहाँ मैं भुलागेंव ओकर ।
बचे जिनगी सिरतोन अँधियार मा हे।

बिना पइसा होवय नहीं काम भइया।
करा लव सबो काम उपहार मा हे।

अपन जान जोखिम करे हे हमेशा।
तभे तो भरोसा वफादार मा हे।

अकेला कहाँ जाबे घूमे ल तैंहा।
बना संगी साथी मजा चार मा हे।

अजय अमृतांशु
भाटापारा (छत्तीसगढ़)

गजल-अजय अमृतांशु

गजल-अजय अमृतांशु

बहरे मुतकारीब मुसद्दत सालिम
फ़ऊलुन   फ़ऊलुन   फ़ऊलुन

बहर - 122    122    122

हमर देश मा अब अमन हे।
इही नेता मन के कथन हे ।

हवै पइसा तब काम होही।
सबो कोती खाली गबन हे।

मदारी करत हे तमाशा ।
सबो आम मनखे मगन हे ।

करै चोरी अउ सीना जोरी।
बने संत गावत भजन हे।

हवै जनता लाचार भारी।
सबो कोती उजरे चमन हे ।

दया नइ रखै जेहा मन मा।
धरे बिरथा वोहा जनम हे ।

लगे लूट मा काला कहिबे ।
बचे नइहे खोखा वतन हे।

अजय अमृतांशु
भाटापारा (छत्तीसगढ़)

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...