गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक्सूर
फ़ऊलन फ़ऊलन फ़ऊलन फ़अल
122 122 122 12
दिनों दिन बढ़त अंधविश्वास हे।
बने लोग मँय वश इँहा दास हे।।
बढ़े ढ़ोंग पाखण्ड हा तो बहुत।
बसे झूठ मन मा बड़ा आस हे।।
सिपाही कलम के बने खाक तैं।
कहूँ चाटुकारी ह्रदय वास हे।।
बँधे पाँव जंजीर जब दासता।
वो मनखे तो जी के भी लाश हे।।
रखे लालसा चीज पद के कहूँ।
समझ ले मनुज के सबो नाश हे।।
रहव दूर चोरी नशा पान ला।
उजाड़े खुशी घर जुआ तास हे।।
गजानंद सच बात ला तो कहय।
दिलाथे धरे झूठ उपहास हे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
Total Pageviews
Wednesday, 2 September 2020
गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
122 122 122 12
सड़क ला बनाये रहिस काल जी।
बने आज सब बर ये जंजाल जी।
बहाये रे पानी ते काबर बता।
सड़क के बना दे बुरा हाल जी।
हवेली खड़ा होत हावय उँखर।
दलाली करे खाय जे माल जी।
शिकायत करे कुछ न होवय सगा।
बड़े आदमी मन बने ढाल जी।
तुहीं ला फँसा तक ओ देही सखा।
चले लोग कानून के चाल जी।
रचनाकार-- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
गजल-अरुण कुमार निगम
गजल-अरुण कुमार निगम
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
*122 122 122 12*
अपन संस्कृति ला भुलावत हवैं।
बरी अउ बिजौरी बिसावत हवैं।
उपजही मया मान कइसे बता
बिदेसी चलन मा झपावत हवैं।
बफ़ौरी अइरसा फरा तसमई
घरोघर ले देखव नँदावत हवैं।
सुपेती ले बाहिर अपन गोड़ ला
बिना सोचे समझे लमावत हवैं।
भला कइसे रखवार उन ला कहन
जउन मन हमर हक़ नँगावत हवैं।
*अरुण कुमार निगम*
छत्तीसगढ़ी गजल-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
छत्तीसगढ़ी गजल-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
उना कोठी हा रही धान बेंचा जही उहू ता का काम के।
रही बस समान दुकान बेंचा जही उहू ता का काम के।
का समोसा चाँट मा भभके पेट अगिन बुझाही कमैया के।
कहूँ बासी चटनी अथान बेंचा जही उहू ता का काम के।
जिये जानवर घलो खा पी फेर हे बड़ दिमाक मनुष करा।
कहूँ मनखे के मया मान बेंचा जही उहू ता का काम के।
दिही काम बेरा बखत मा कहिके धरे रतन खपा के गतर।
धरे रहिबे पाँख उड़ान बेंचा जही उहू ता का काम के।
कथे साधना मा सँवरथे मनखे के ज्ञान गुण कला गान हा।
गुनी ज्ञानी मनके जुबान बेंचा जही उहू ता का काम के।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गजल- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
धरे बात सत्य बढ़े चलव, तभे मोल जिनगी के मान ले।
बढ़ा पाँव ला रखे हौसला, मिले जीत तब तो सदा ठान ले।।
जले हे जमाना मया देख के, करे कोंन कब हे कदर भला।
मिटा ना सके कभू तो मया, जगे मन हिलोर उफान ले।।
बनौ देश वीर सिपाही तुम, सदा नाम मान अमर रही।
लुटा जान रक्षा वतन करौ, जियौ शान से मरौ शान ले।।
धरे रूढ़िवादी परंपरा, बढ़े जात लोग समाज हा।
मिटे अन्धभक्ति सबो ढोंग जग, बढ़ा पाँव आज धियान ले।।
कहे सत्यबोध उठौ अउ बढ़ौ, करौ काम देश समाज हित।
मिला हाँ मा हाँ चलौ झन कभू, सही का गलत बने जान ले।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
दुर्गा शंकर ईजारदार
दुर्गा शंकर ईजारदार
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
इँहे गारी मिलथे जुबान मा,इँहे वाह मिलथे जुबान मा,
बने मीठ भर ले जुबान मा ,तभे नाम होहि जहान मा।।
बड़े किमती वोट हे तोर गा ,बने सोंच के तैं तो वोट दे ,
भला चेहरा रहे आदमी ,रखे का हवस ग निशान मा।।
बड़ा पाव पिज्ज़ा मलाई मा,न पुलाव मैगी मजा हवय,
जे मजा मिले सरी जात के,इहाँ बोरे बासी अथान मा।।
मया फूल खीले हृदय तरी,मया भाग से मिले जान जी,
मया माँगे मिलथे न जान ले,न मिले कहूँ ग दुकान मा।।
लिखौ गीत कविता किसान के,लिखौ गीत सत्य के जीत के,
लिखौ गीत देश महान हे,लिखौ गीत देश बखान मा।।
ददा दाई घर से निकाल के,तैं तो डंडा मार भगाय रे,
मरे बाद दाई ददा के तो,करे खर्च पिंड के दान मा।।
बड़े कारखाना लगे हवय,रे इजारदार सरी जगा,
सबो परिया पर गे हे खेत रे,नहीं पेड़ राज मचान मा।।
दुर्गा शंकर इजारदार
सारंगढ़ (छत्तीसगढ़)
Friday, 28 August 2020
ग़ज़ल -आशा देशमुख*
**ग़ज़ल -आशा देशमुख*
*बहरे कामिल मुसम्मन सालिम*
*मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन* *मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन*
*11212 11212 11212 11212*
सुनो जिंदगी के ये खेल मा, कभू हार हे कभू जीत हे।
कभू सुख बसे हे घाम मा, कभू तो लुभाय ये शीत हे।
का लिखाय हे यहू जान ले ,तहीं पढ़ अपन खुदे हाथ ला,
जेन पढ़ सके तोर आँख ला, उही ला समझ सही मीत हे।
इहाँ रोज रोज कमात हस,कहाँ ले जबे तेँ सकेल के
कभू भीतरी ल भी देख ले,ये भराय मन मया प्रीत हे।
ये बजात हे कोई रोज धुन,सुनो टेर देके जी कान ला
ये हवा नहर के हिलोर मा,सबो जग जहाँन म गीत हे।
नही आय काम जी छल गरब,कभू सोच झन तेँ जुगाड़ बर
इहीं हे जनम इहीं हे मरण,इही तो जगत के जी रीत हे।
आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा
गजल
गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...
-
गजल बहरे हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्फूफ़ मक़्फूफ़ मुख़न्नक सालिम मफ़ऊल मुफ़ाईलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन 221 1222 221 1222 रेंगत हे गलत रस्ता इंस...
-
गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...
-
🌹 ग़ज़ल -आशा देशमुख 🌹 *बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]* *फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन* *1121 2122 1121 2122* वो लगाय नेकी...