छत्तीसगढ़ी गजल-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
उना कोठी हा रही धान बेंचा जही उहू ता का काम के।
रही बस समान दुकान बेंचा जही उहू ता का काम के।
का समोसा चाँट मा भभके पेट अगिन बुझाही कमैया के।
कहूँ बासी चटनी अथान बेंचा जही उहू ता का काम के।
जिये जानवर घलो खा पी फेर हे बड़ दिमाक मनुष करा।
कहूँ मनखे के मया मान बेंचा जही उहू ता का काम के।
दिही काम बेरा बखत मा कहिके धरे रतन खपा के गतर।
धरे रहिबे पाँख उड़ान बेंचा जही उहू ता का काम के।
कथे साधना मा सँवरथे मनखे के ज्ञान गुण कला गान हा।
गुनी ज्ञानी मनके जुबान बेंचा जही उहू ता का काम के।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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Wednesday, 2 September 2020
छत्तीसगढ़ी गजल-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
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गजल
गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...
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