गजल-अरुण कुमार निगम
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
*122 122 122 12*
अपन संस्कृति ला भुलावत हवैं।
बरी अउ बिजौरी बिसावत हवैं।
उपजही मया मान कइसे बता
बिदेसी चलन मा झपावत हवैं।
बफ़ौरी अइरसा फरा तसमई
घरोघर ले देखव नँदावत हवैं।
सुपेती ले बाहिर अपन गोड़ ला
बिना सोचे समझे लमावत हवैं।
भला कइसे रखवार उन ला कहन
जउन मन हमर हक़ नँगावत हवैं।
*अरुण कुमार निगम*
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