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Monday, 28 September 2020

गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212  2212


बम्बर बरे अब पेड़ हा।

कइसे फरे अब पेड़ हा।1


 दै फूल फल औषध हवा।

का का करे अब पेड़ हा।2


मनखे जतन करथन कथे।

तभ्भो मरे अब पेड़ हा।3


घर गाँव बन रद्दा शहर।

काखर हरे अब पेड़ हा।4


बरसा घरी बुड़ जात हे।

लू मा जरे अब पेड़ हा।5


के दिन जी पाही भला।

दुख डर धरे अब पेड़ हा।6


जीवन बचा ले काट झन।

पँइया परे अब पेड़ हा।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 गजल- जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212  2212


झरना बने झरथे नदी।

सागर चरण परथे नदी।1


गाँव अउ शहर तट मा बसा।

दुख डर दरद दरथे नदी।2


बन बाग बारी सींच के।

आशा मया भरथे नदी।3


चंदा सितारा संग मा।

बुगबाग बड़ बरथे नदी।4


नभ तट तरू के दाग ला।

दर्पण बने हरथे नदी।5


बढ़ जाय बड़ बरसात मा।

गरमी घरी डरथे नदी।6


धर कारखाना के जहर।

जीते जियत मरथे नदी।7


तरसे खुदे जब प्यास मा।

दुख दाब घिरलरथे नदी।8


देथे लहू तन चीर के।

दुख देख ओगरथे नदी।9


जाथे जभे सागर ठिहा।

आराम तब करथे नदी।10


खुद पथ बना चलथे तभे।

तारे बिना तरथे नदी।11


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मख़बून मरफू मुखल्ला 

मुफाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन

1212 212 122 1212  212 122  


जनम लिए घर मा मोर आये खुशी लुटावय हमार बेटी 

चहक उठे घर महक उठे दर जे खिलखिलावय हमार बेटी। 


कभू रखे गोद मा सुलावय ददा कका अउ बबा तको हर।  

कभू झुलावत हे दाई पलना त मुस्कुरावय हमार बेटी। 


कभू अँगन मा ठुमक चलत हे कभू गली मा तको निकल जय। 

छमक-छमक छम बजे पजनिया बने बजावय हमार बेटी। 


पढ़े लिखे के समे ह आगे चलव पढाबो ग चेत करके। 

लिखे पढ़े मा सदा हे अउवल इनाम पावय हमार बेटी।


उड़े कभू मन अकाश चाहय उड़ा सके नइ जमाना डर के। 

नजर गड़ाये रहे शिकारी कहाँ उड़ावय हमार बेटी। 


बिहा करे के करव न जल्दी अभी समे हे तनिक ठहर जव। 

अभी जमाना ल हे दिखाना का कर दिखावय हमार बेटी।


कका ले काकी बबा ले दादी ममा ले मामी नता कहाये।

ददा ले दाई बिहाय भौजी नता निभावय हमार बेटी। 


रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

गजल- अजय अमृतांशु

 गजल- अजय अमृतांशु


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

 

मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन

2212 2212 


नेकी के सुग्घर काम कर ।

जग मा अपन तैं नाम कर।


संघर्ष जिनगी भर हवय।

झन तैं चिटिक आराम कर। 


ट्रैफ़िक हवय बड़ जोर के।

रद्दा ल झन तैं जाम कर।


झन दाब कोनो झूठ ला। 

सच्चाई ला अब आम कर।


जल्दी पहुँचना हे शहर। 

बेरा बुड़त झन शाम कर।


दाई ददा घर मा हवय ।

तैं घर ल चारो धाम कर ।


सम्मान ले जीना हवय । 

इज्जत ला झन नीलाम कर।


जिनगी "अजय" बस युद्ध ये।

हर क्षण कहय संग्राम कर ।


अजय "अमृतांशु"

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

ग़ज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 ग़ज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

बहरे रजज मुरब्बा सालिम

मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन

2212 2212


दुनियाँ के कइसन ढंग हे

छिन छिन मा बदलत रंग हे


खुश नइ दिखय कोनो इहाँ

जिनगी मा सबके जंग हे


अंतर हे करनी कथनी मा

मति देख सुनके भंग हे


मन चंगा हे जेखर सदा

ओखर कठौती गंग हे



दुख के बखत चलथे पता 

 हे कोन दुरिहाँ संग हे


ज्ञानु

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 


बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 

मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन

2212   2212 


काकी सुनावत बात हे।

बइठे कका कनवात हे।


लबरा लबारी मार के। 

उल्लू बनाये जात हे। 


घनघोर बादर छाय हे। 

जइसे लगे बरसात हे। 


जब काम हे तब राखथे। 

फिर मार देवत लात हे। 


बेटा हवेली मा रहे। 

माँ बाप कुटिया छात हे। 


तँय साँप ला झन पालबे। 

करथे सखा आघात हे। 


कतको सुरक्षित रख भले। 

ले चोर जावय रात हे। 


रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹

 🌹*ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹


*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*

 

*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*

 *2212 2212*



झन जाव घर ला छोड़ के

लावव नहर ला मोड़ के।


जिनगी कहाँ पानी बिना

पीयव कुआँ ला कोड़ के।


रहिथे अलग सब फूल मन

माला रखे हे जोड़ के।


शुभ सोच हा आघू बढ़े

बाधक नियम ला तोड़ के।


भीतर भराये हे गुदा

खावव चिरौंजी फोड़ के।


आशा देशमुख

एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

गजल

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