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Friday, 15 January 2021

गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी 


बहरे हजज़ मुसम्मन मक्बूज 

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212


का घाम छाँव मा लड़ाथे नानजात मन अबड़

शहर का गाँव मा लड़ाथे नानजात मन अबड़


बताँव का हवय परे ग कीरा चाल मा इँखर

फँसा के दाँव मा लड़ाथे नानजात मन अबड़


निकल जथे इँमन लगा के आग जाँति पाँति के 

धरम के नाँव मा लड़ाथे नानजात मन अबड़


निपट जतिस तो लोकतंत्र के तिहार शाँति ले

सदा चुनाव मा लड़ाथे नानजात मन अबड़


कहूँ तो जीत गे चुनाव 'ज्ञानु' फेर पूछ झन 

हे ठाँव ठाँव मा लड़ाथे नानजात मन अबड़


ज्ञानु

ग़ज़ल -आशा देशमुख*

 *ग़ज़ल -आशा देशमुख*


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम*


*फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन*


*212 1222 212 1222*


धान अन्न बेचे बर जाये भाव तो नइहे।

माँग कोन कइसे सुनही चुनाव तो नइहे।


हाथ पाँव थक जाथे रात दिन हवे चलना

घाम शीत बरखा चलथे पड़ाव तो नइहे।


कोन बंद करही दानव दहेज के मुँह ला

नेवता शहर भर भेजे हियाव तो नइहे।


लाभ बस अपन देखें साथ नइ निभाये हे

प्रश्न के लगे लाइन हे सुझाव तो नइहे।


खेत में फसल ला अब तो खड़े खड़े बेचें

फ्लेट के जमाना आये पटाव तो नइहे।


लूट लूट के मेवा खाये भरे तिजोरी ला

लेवना सही बोली पर लगाव तो नइहे।


ये सफर हवे जिनगी के चलो चलो आशा

हाँफगे चले हस थोकिन चढ़ाव तो नइहे।


आशा देशमुख

ग़जल- अजय अमृतांशु

 ग़जल- अजय अमृतांशु


बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम

फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन


212 1222 212 1222


होही माटी सब कुछ काबर बता धरत हावस। 

पाई पाई जोड़े काबर बता मरत हावस।


भोगना हवय सब ला कर्मदंड जे हावय।

फेर काम गंदा काबर बता करत हावस।


योजना बनत हे अब स्वार्थ सिद्धि के खातिर।

देश नोहे चारा काबर बता चरत हावस।


हे हिसाब सबके भगवान के रजिस्टर मा। 

पाप के घड़ा ला काबर बता भरत हावस।


काम कर हमेंशा सच्चाई के डगर चल के। 

जब डगर हे सच के काबर बता डरत हावस। 


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

ग़जल- चोवा राम 'बादल'

 ग़जल- चोवा राम 'बादल'


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम*

फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन


212 1222 212 1222


कर्म के कलम धरके भाग हम लिखे करबो

ज्ञान के उघारे आँखी चलौ पढ़े करबो


मोह के हरा चारा लालची बना देथे

मेंछराथे मन बछवा नाथ ला कसे करबो


घर तभे तो घर होही जब उहाँ अपन होही

भूल चूक अपने के नइ कभू गने करबो


पाँव मा गड़े काँटा हा अभर पिराथे बड़

लोचनी मया के धर वोला तो इँचे करबो


बिरथा हे बने छप्पन भोग सोच लेवव गा

भूखहा के दू कौरा भात मा रहे करबो


चोवा राम 'बादल'

हथबंद,छत्तीसगढ़

ग़जल- चोवा राम 'बादल'

 ग़जल- चोवा राम 'बादल'


*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम*

फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन


212 1222 212 1222


छूट जाही धन दौलत एक दिन तैं मर जाबे

कर कमाई पुन के संगी उही ला धर जाबे


मस्ती मा कबीरा गाले बने उलटबाँसी

बस जबे सबो के दिल तैं भले उजर जाबे


पक्का जान लेबे गा जिंदगी अउँट जाही

पानी कस कहूँ डबरा मा भरे ठहर जाबे


घेंच ला अँकड़ के चलबे डगर त का मिलही

फेंक दे अहम ला तब प्रेम बन बगर जाबे


धूल झन नजर ककरो झोंकबे  कभू 'बादल'

सोच ले नजर ले सबके तुरत उतर जाबे


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'


ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'


बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम

फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन

212 1222 212 1222


काम धाम करबे तब नाम तोर होही गा।

सत्य बाट चलबे तब जग मा शोर होही गा।


छोड़ दे नशा ला ये आय रोग-बीमारी,

चक्क साफ बढ़िया जिनगी के खोर होही गा।


देखबे जी पीरा के रात ये पहाही झट,

सुख सुरुज निकल आही लउहे भोर होही गा।


भाग के भरोसा मा काम हा बिगड़ जाथे,

गढ़ खुदे अपन किसमत तोरो जोर होही गा।


एक हो के रहिबो तब भाग जाही बइरी मन,

शांति अउ बिना भय के झार छोर होही गा।


बाँध ले मया मा तैं आव गा सबो झन‌ ला,

प्रेम ताग जुर जुर के पोठ डोर होही गा।


देख तो निचट खबड़ा अपखया मनी होगे,

कोनो जान पाइस नइ वो हा चोर होही गा।


- मनीराम साहू 'मितान'

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गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 गज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी 


बहरे हजज़ मुसम्मन अशतर मक्फ़ूफ मक्बूज मुखन्नक सालिम

फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलन 

212 1222 212 1222


हे गिरे कहूँ कोनो मिलगे उठावत चल

भूलगे हवय कोनो रसता दिखावत चल 


गड़ घलो कभू जाथे कोन जानथे भाई

रसता मा परे काँटा खूँटी हटावत चल 


काम आय नइ घर ला टोर कभू ये देथे

लोभ अउ सुवारथ के कचरा ला जलावत चल 


नइ बना सकस कुछु कखरो बिगाड़ झन भाई

हो सकय अपन ता भाई हाथ ला बँटावत चल 


हाथ पाँव तँय कतको मार होना जें होथे

बस अपन करम के डंडा इहाँ ठठावत चल 


भूलना कहूँ तोला दुख दरद अपन हावय

बनके मस्तमौला गाना मया के गावत चल 


सोच दूर हे मंजिल 'ज्ञानु' हटबे पीछू झन 

छोड़ डर फिकर संसो पग अपन बढ़ावत चल 


ज्ञानु

गजल

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