छत्तीसगढ़ी गजल - मोहन लाल वर्मा
2122 2122 212
मँय मयारू तोर अँव पहिचान ले ।
मोर हिरदे के मया ला जान ले ।।
रूप हे चंदा सहीं मन मोहनी,
भेंट माँगे का हवस भगवान ले ?
कर भरोसा मँय दगा देवँव नहीं,
चल कछेरी मा लिखा ईमान ले ।
मोर पबरित हे मया संसार मा,
जस निकलथे सोन-हीरा खान ले।
झाँक के तँय देख ले इतिहास मा,
नइ घुँचे हावँव कभू मैदान ले।
भागमानी तोर बेटा आँव मँय,
रोज लहराथँव तिरंगा शान ले।
मोर जिनगी के अँजोरी पाख तँय ,
आज ये "मोहन" कहय ऊँचान ले।
गजलकार - मोहन लाल वर्मा
अल्दा, जिला - रायपुर, छत्तीसगढ़