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Sunday, 15 January 2023

गजल

 गजल

2122 2122 2122

पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे।

दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे।


वोट देके कोन ला जनता जितावैं।

झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे।


खात हावँय घूम घुमके अरदली मन।

सिर नँवइयाँ के मुड़ी ला फोड़ होगे।


बड़ सरल हावय बुराई के डहर हा।

सत लगिस मुश्किल कहूँ ता छोड़ होगे।


मौत के मुँह मा समागे देवता मन।

काल के असुरन तिरन अब तोड़ होगे।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 18 September 2021

गजल-जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"

 गजल-जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"



*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*



*मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन*



*2212 2212 2212*




अब बता


बिन काम के पद नाम होगे अब बता।

पैसा पहुँच मा काम होगे अब बता।।1


दू टेम के रोटी कहाँ होइस नशीब।

गारत पछीना शाम होगे अब बता।2


केंवट के शबरी के पुछइया कोन हे।

रावण के थेभा राम होगे अब बता।3


कहिथें चिन्हाथे खून के रिस्ता नता।

बिरवा ले बड़का खाम होगे अब बता।4


नइ मोल मिल पावत हे असली सोन के।

लोहा सहज नीलाम होगे अब बता।5


फल फूल तारिक चीज बस अउ आदमी।

का खास सब तो आम होगे अब बता।6


धन जोर के करबोंन का रटते हवन।

कोठी फुटिस गोदाम होगे अब बता।7



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

Thursday, 29 April 2021

ग़ज़ल -जीतेंन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'*

 ग़ज़ल -जीतेंन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'*


*बहरे रमल मुरब्बा सालिम*

*फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन*

*2122 2122*


पैदा होवत पर निकलगे।

फूल के बिन फर निकलगे।1


बाहिरी मा खोज होइस।

चोर घर भीतर निकलगे।2


दू भुखाये लड़ते रहिगे।

पेट तीसर भर निकलगे।3


सर्दी अउ खाँसी जनम के।

आज बड़का जर निकलगे।4


घुरघुरावत जी रिहिस बड़।

हौसला पा डर निकलगे।5


गाय गरुवा मन घरे के।

सब फसल ला चर निकलगे।6


जेन ला झमझेन दाता।

साँप वो बिखहर निकलगे।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



Sunday, 14 February 2021

ग़ज़ल -आशा देशमुख 🌹

 🌹 ग़ज़ल -आशा देशमुख 🌹


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*


*1121 2122 1121 2122*


वो लगाय नेकी पौधा अभी नान नान बाढ़े

दुनो हाथ ले लुटाये वो धरम के मान बाढ़े।



कहूँ  हा सकेले सोना कहूँ हा सकेले माया

तहूँ खोल पाठशाला उहाँ रोज ज्ञान बाढ़े।


भरे हे जगत मा दाता ये भरात हे तिजोरी 

कभू तँय लुटा मया ला इही प्रेम दान बाढ़े।


ये सुनार के हे सोना,ये किसान के हे खेती

हे मिलाय ताम पानी तभे भार धान बाढ़े।


भुजा मा करे भरोसा  लगे रात दिन लगन हे

सहे लाभ हानि सब मा तभे तो दुकान बाढ़े।


का बिगाड़े छोट नीयत रहे साथ जब विधाता

कती ले खिंचाय साड़ी कती ले ये थान बाढ़े।


ये ख़िरत हे खेती बारी, दिखे नइ तको चरागन

हवे नान छोट डोली भूमि के लगान बाढ़े।


आशा देशमुख

गजल


 *बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*

*1121 2122 1121 2122*


लमा हाथ सत धरम बर तभे जग मा नाँव मिलही।

लगा पेड़ ला सुमत के तभे सुख के छाँव मिलही।


लगे भाँय भाँय अँगना गली खेत खार सुन्ना।

सजे मोर आँख सपना कहाँ अब वो गाँव मिलही।


चले तोर जोर जाँगर हवे तब तलक पुछाड़ी।

धरे आय तन बुढ़ापा तहाँ हाँव हाँव मिलही।


बिछे जाल छल कपट के इहाँ देख ताक चलबे।

रचे कूटनीति के अब घरों घर मा ठाँव मिलही।


बचा आज तैं गजानंद अपन आप ला इहाँ जी।

कहे जेन ला अपन तैं सदा ओखरे से घाँव मिलही। 


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'

 ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*


*1121 2122 1121 2122*


नवा दग‌ बिहान आही गियाँ थोरकिन सबर कर।

करू रात हा पहाही गियाँ थोरकिन सबर कर।


भले हे अभी रिसाये सखा तोर वो मयारू,

मया गीत गुनगुनाही गियाँ थोरकिन सबर कर।


कुआँ आस के खने हस सही ज्ञान जल निकलही,

बढ़े प्यास ला बुझाही गियाँ थोरकिन सबर कर।


कला जानथस चिखे के कहे गोठ ला सबन‌ के,

कसा मीठ कस जनाही गियाँ थोरकिन सबर कर।


ले के हार के सहारा बड़े जीत पा जबे गा,

ते हा सत्य बाट राही गियाँ थोरकिन सबर कर।


सरी दिन जपन‌ करे हस हवे हरि अबड़ दयालू,

नठे काम वो बनाही गियाँ थोरकिन सबर कर।


रखे राह गा भरोसा मनी हे मितान‌ सब के,

वो हा दोसती निभाही गियाँ थोरकिन सबर कर।


- मनीराम साहू 'मितान'

गजल-इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

 गजल-इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*

*1121 2122 1121 2122*


नवाँ माथ गुरु चरण मा सुखी तोर द्वार होही।

फँसे बीच नाँव जिनगी कृपा गुरु पा पार होही।


रखे दूर गुरु बुराई जला जोत ज्ञान हिरदे।

खड़े ढाल बन बिपत मा जिहाँ सच पुकार होही।


सहीं राह गुरु दिखाये मिले बड़ नसीब ले वो।

सजे मन घड़ा बरोबर पड़े हाथ गुरु कुम्हार होही।


पढ़ा पाठ एकता गुरु कहे संग संग रइहौ।

रहे मान शिष्य गुरु के इही बात सार होही।


जपे नाम ला गजानंद सदा अपन तो गुरु के।

मिले तोर ज्ञान के जनमो जनम उधार होही।


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

मुकम्मल ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'

 मुकम्मल ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*


*1121 2122 1121 2122*


हवे पार वो लगइया तें श्री राम के भजन‌ कर।

इही नाँव हे तरइया तें श्री राम के भजन‌ कर।


जे हा हाँस के गइस बन हरे बर सबन‌ के पीरा,

ददा के कहे मनइया तें श्री राम के भजन‌ कर।


नदी के करार पहुँचिस चढ़े नाव‌ के बहाना,

गुहा भाग के बनइया तें श्री राम के भजन‌ कर।


हवे एक जात मनखे इही बात ला बताइस,

जुठा बेर के खवइया तें श्री राम के भजन‌ कर।


बना के मितान मरकट भला काम जे करे हे,

सदा दोसती निभइया तें श्री राम के भजन‌ कर।


लिखे नाँव ले उफल गय बड़े ले बड़े वो पथरा,

सदा सत्य शिव जपइया तें श्री राम के भजन‌ कर।


कटा मूड़ ला जी रावन तरे जात कुल के सुद्धा,

मनी मन सदा बसइया तें श्री राम के भजन‌ कर।


- मनीराम साहू 'मितान'

गजल- अजय अमृतांशु

 गजल- अजय अमृतांशु


बहरे कामिल मुसम्मन सालिममुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन 

11212  11212  11212  11212


कभू बात करबे बने समझ के निकालबे गा जुबान ले। 

हवे बात जे बने काम के तहूँ पूछ ले जी सियान ले। 


दगा दे के तैं कहाँ जाबे जी हवे दुनिया गोल बताँव जी।

भला अउ बुरा मिले एक दिन  दुनो के नतीजा हा मान ले। 


भले काम बर सबो आव आघु इही मा सार हवे सुनव। 

बने काम के जी नतीजा होथे बने ये बात ला जान ले।


हे अकेला चलना ये रद्दा जिनगी के काँटा ले भरे जान ले। 

बढ़ा के कदम,नहीं रुकना हे,भले आँधी आय ये ठान ले।


मिले ज्ञान हा जिहाँ भी बने धरे कर "अजय" सबो सार ला। 

कहाँ ले बिसाबे तहीं बता मिले ये कभू ना दुकान ले।


अजय अमृतांशु

भाटापारा ( छत्तीसगढ़ )

Thursday, 11 February 2021

ग़ज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 ग़ज़ल-  ज्ञानुदास मानिकपुरी 


बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मजाइफ़ [दोगुन]

फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन 

1121 2122 1121 2122


लहू मा जी तोर मारत हे अबड़ उबाल काबर 

कुछू जब मिलय नही रोज करे बवाल काबर 


सुने हँव के बात मा तोर हवय अबड़ के दम जब

करे नइ कुछू इहाँ आज तलक कमाल काबर 


दिखा दव विकास ऊपर म विकास जब करे हव

दिखे नइ सुधार अउ  जस के ग तस हे हाल काबर 


सही ताय कतको ल नाम गरीब के इहाँ बस 

बना योजना तुमन लेव डकार माल काबर 


का बताँव बढ़ जथे 'ज्ञानु' दरद हा देखथँव ये

इहाँ अपने ह खिंचै अपने के रोज खाल काबर 


ज्ञानु

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 


बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]


फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन


1121 2122 1121 2122 


बबा के कमाये धन मा ददा हर पुटानी मारे। 

करे हे बहुत दिखावा जुआ मा तकोच हारे। 


बचे नइ हवय तनिक भी जगा खेत खार भर्री।  

चले मोर घर ह कइसे बिना काम बिन सुधारे।


उठे हे उफान नदियाँ बहे तेज धार भारी।

फँसे जिंदगी के नइया बता कोन अब उबारे। 


परे राह मा जे पथरा चला मिल अभी हटाबो। 

नहीं ते हपट जही जी चले राह जे बिचारे। 


गरी खेल के फँसाथे गुथे मोह माया चारा। 

फँसे लालची जे मछरी दिखे दिन तको म तारे।


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

ग़ज़ल -आशा देशमुख 🌹

 🌹 ग़ज़ल -आशा देशमुख 🌹


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*


*1121 2122 1121 2122*


घुमे सच गली गली मा रमे झूठ  हाट देखे

कहाँ हे रतन चिन्हैया चुपे सोन बाट देखे।


बहे खून धार नदिया होय हे अबड़ लड़ाई

हे गवाह सब किला मन सबो राजपाट देखे।


बिछे पाँव मा गलीचा लगे फूल कांस थारी

अभी दाना बर तरसथे कभू शान ठाट देखे।


इहाँ ले उहाँ घुमत हे धरे हे सबो के नस ला

हवे कोन मीठ सिठ्ठा जेहा घाट घाट देखे।


करौ कर्म मा भरोसा इही भाग ला बनाये

सुने हँव मरे सड़क मा जेन हा ललाट देखे।



आशा देशमुख

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा


बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]


फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन


1121 2122 1121 2122


जभे मोर मन से लिखहूँ  तभे काम मोर होही।  

रहे भाव जब भराये तभे नाम मोर होही। 


ये कहाँ फँसे हवँव मँय,बँधे मोह माया बंधन।

करे बर परे तपस्या तभे राम मोर होही। 


दही बर नचाये गोपी त दिखाय नाच कान्हा। 

मया मा रिझाहुँ मँय हर तभे श्याम मोर होही।


करे जेन हर दिखावा वो कहाँ चले सफर मा। 

रमे मन जहाँ रमाये तभे धाम मोर होही।


परे हे डगर डगर मा रहे सिरतो नइ पुछारी।

सजे राह मा जे आहूँ तभे दाम मोर होही। 


रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार

गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 गजल-जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*


*1121 2122 1121 2122*


बता मूँद के नयन ला, बने राह छाँट पाबे।

नदी अउ कुँवा मा मनके, का मइल ला माँज पाबे।


चले गोठ बात भारी, कभू सच कभू लबारी।

उना पेट हा रही ता, कहाँ कूद नाँच पाबे।


भरे हे नँगत खजाना, कही के लगे लुटाना।

खुदे उस्तरा चलाबे, उड़े बर का पाँख पाबे।


धरे आन मनके गलती, हँसे मार मार कलथी।

कहूँ चूक तोर होही, बता तब का हाँस पाबे।


चले चारो खूँट चरचा, छपे हे गजब के परचा।

उड़े बात जब हवा मा, बता तोप ढाँक पाबे।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गज़ल- अजय अमृतांशु

 गज़ल- अजय अमृतांशु


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]

फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन

1121 2122 1121 2122


मजा हे बताँव ओखर कहाँ वो बतात हावय।

ददा हे कमात वो घर मा हे बइठे खात हावय। 


ददा तरसे पानी पीये,कहाँ तिर मा बेटा आवय। 

परे हे कुकुर के पाछू उही ला खवात हावय। 


हवे भारी सेना भारत के सबो ये जान डारिन। 

तभे दुनिया गुण ला भारत के अबड़ जी गात हावय। 


धनी गे हे जब ले परदेस बताय काला वोहा।

रो धो के ये जिनगी बीतत ले दे के पहात हावय। 


का भरोसा साँस के थम जही ये"अजय"कभू भी।

करे राह काम पुन के इही सार बात हावय। 


अजय अमृतांशु

भाटापारा ( छत्तीसगढ़ )

ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'

 ग़ज़ल - मनीराम साहू 'मितान'


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*


*1121 2122 1121 2122*


टुरा काय ये करत हे लुका पासथे जमाना।

धरे जाल फास नँगते सदा फाँसथे जमाना।


कभू भाय नइ‌ गा कोनो मया बात मोर चिटको,

खड़े हो कुरा ससुर बन जला खाँसथे जमाना।


बने खूब आड़ बाधा हवे बाट मा अबड़‌ के,

कभू जाय टूट एमन बढ़ा ठाँसथे जमाना।


रुँधे हें कपट के काँटा लगे स्वार्थ के गा बारी,

हिँटे ना कभू रुँधानी जमा धाँसथे जमाना।


लुहा के मताय ठेनी करे खूब गा तमासा,

मजा बर बने गा कुकरा खड़े बासथे जमाना।


कभू तो मितान‌ गाथे बने धुन मा गुनगुनाथे,

बढ़े बल बिचार मन के गिरा हाँसथे जमाना।


- मनीराम साहू 'मितान'

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव सिंह

 छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल-सुखदेव सिंह


बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]

फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन


 1121 2122 1121 2122


बना चेहरा ल चन्दा जे सगा चकोर बनगे

तहॉं जानले बिचारा ह मया के ढोर बनगे


ए मया मिलन के किस्सा समे आज ले सुनाथे 

कभू लास बनगे नइया कभू सॉंप डोर बनगे


टुरी दिल ल का चोराइस टुरा कामचोर बनगे

इही बात के बहाना एक शेर मोर बनगे


समे संग छोइहा के धरे रूप रस के राजा

ए मरम बताए खातिर हॉं गवाही खोर बनगे


न उला न पोठ सानी सुखदेव शायरी मा

गुरूदेव के असीस ले ये गजल सजोर बनगे


-सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर''

गज़ल- अजय अमृतांशु

 गज़ल- अजय अमृतांशु


बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212  212  212  212


देश के रक्षा बर मरना हे जान ले। 

बैरी आघू खड़े तोप ला तान ले। 


मूँड़ी कटही भले फेर झुकही नहीं।

ये तिरंगा सदा फहरै जी शान ले। 


सीमा के रक्षा बर मैं अडिग रहिथौं जी।

देश भीतर के बैरी तैं पहिचान ले। 


चेत जावय अभी जेन गद्दार हे। 

भूल के झन कभू खेलहू आन ले।


घेरी बेरी मचावत हे उत्पात उन।

आज बैरी ला देबो सबक ठान ले।


जीत वोकर हमेशा ही होथे"अजय"।

जेन लड़थे अखड़ के जी तूफान ले।


अजय अमृतांशु

भाटापारा (छत्तीसगढ़)

गजल-चोवा राम 'बादल'

 गजल-चोवा राम 'बादल'


*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*


*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*


*1121 2122 1121 2122*


कली बनही फूल तब आबे रे भँवरा जा अभी तैं

इहाँ घेरी बेरी आ आके ना इँतरा जा अभी तैं


गिरा मत फुहार सावन सरी अंग हा सिहरगे

धनी आही ता चले आबे न  बरखा जा अभी तैं


बता मत शहर मा का का हे नवा उदीम होये

मिटे चिनहा गाँव के खोज वो लाना जा अभी तैं


बिना हेलमेट के गाड़ी चलाना छोड़ देना

गिरे मूँड़ फूट जाथे लगा के आ जा अभी तैं


अरे दू कदम चले हस थके पाँव दिखथे 'बादल'

अजी नइये तोर दमखम बने सुरता जा अभी तैं


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

ग़ज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी

 ग़ज़ल- ज्ञानुदास मानिकपुरी 


बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मजाइफ़ [दोगुन]

फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन 

1121 2122 1121 2122


कभू काम हर कहाँ बनथे हताश होय मा सुन 

मिले कुछ घलो नइ चुप्प उदास होय मा सुन 


सबो मिल बढ़ाबो जब हाथ हमन जरूर कहिथँव

इहाँ रोक कोन सकही ग विकास होय मा सुन 


बने सावचेत रहना हे करत हियाव अपने

कहाँ देर फेर लगथे जी विनाश होय मा सुन 


पिये परही तोला पानी तभे तो पियास बुझही

बुझे  हे कहाँ कखरो ग नदी पास होय मा सुन 


पहा जिनगी ला सुघर 'ज्ञानु' सदा हँसी खुशी मा

मिले कुछ नही ग जिंदा रही लाश होय मा सुन 


ज्ञानु

गजल

 गजल 2122 2122 2122 पूस के आसाढ़ सँग गठजोड़ होगे। दुःख के अउ उपरहा दू गोड़ होगे। वोट देके कोन ला जनता जितावैं। झूठ बोले के इहाँ बस होड़ होगे। खा...