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Sunday, 6 December 2020

ग़ज़ल--जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 ग़ज़ल--जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


*बहरे रमल मुसमन महज़ूफ़*


फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन


*2122 2122 2122 212*


रिस हवय तनमन मा अब्बड़, मुँह फुलाये आय हँव।

चुप रहे हँव आज तक मैं, मुँह उलाये आय हँव।1


तैं बुलाथस रोज मोला, पर भरोसा तोर का।

मैं कहाँ घर लाँघथौं पर, अब बुलाये आय हँव।2


मन तिजोरी मा मया के, हे खजाना बड़ अकन।

हारहूँ सब तोर कर, पासा ढुलाये आय हँव।3


मोर नरमी देख के, पोनी घलो जाथे लजा।

चाब डर या लील डर मैं, गुलगुलाये आय हँव।4


नइ घुलत हे रँग मया के, तोर घोरे मा बही।

कर चिटिक चिंता झने, मैंहर घुलाये आय हँव।5


आज मदिरालय मा ठाढ़े, जाम ढोंकत हँव गजब।

मोला झन कहिबे शराबी, गम भुलाये आय हँव।6


खाय हँव धोखा गजब, मैंहर मया बाजार मा।

हाँस ले रे खैरझिटिया, गुदगुदाये आय हँव।7


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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