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Thursday, 7 January 2021

ग़ज़ल---चोवा राम 'बादल'

 ग़ज़ल---चोवा राम 'बादल'


*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*


*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*


*2122 1122 1122 22*


राम लछिमन के सही आज कहाँ भाई हे

देख ले झाँक जमे मन म निचट काई हे


सोच ले सोच म दुनिया ह पलटही सिरतो

सोच के राह म तो मोड़ हे गोलाई हे


बाँट अपने ल सरी चीज ल पोटारे हस

तोर अउ मोर के कोड़ाय गहिर खाई हे


काट जंगल के सबो रुख तैं सड़क लाबे का

योजना टार तुरत जेन ह दुखदाई हे


हाल बेहाल हवै अन्न के उपजइया मन

कुर्सी वाला के बने हलवा तो झोराई हे


 दोगला  जेन अबड़ घेंच ल अँइठे हावय

 अउ दिखावा के हमर पीठ ल थपकाई हे


प्यार हे सच्चा अगर तोर कहूँ रे 'बादल'

जान ले मिटना तको प्यार के भरपाई हे


चोवा राम 'बादल'

हथबंद, छत्तीसगढ़

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