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Friday, 1 January 2021

ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹

 🌹 *ग़ज़ल --आशा देशमुख*🌹


*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*


*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*


*1222 1222 1222*


संशोधित


भरे कोठी ह सूपा बर अटक जाथे

अबड़ हुशियार तक रद्दा भटक जाथे।


बनाये हस महल बइठे झरोखा मा

उड़त कचरा कभू आँखी खटक जाथे।


नता रिश्ता सँभालव आँच झन आवय

हवय ये काँच जइसे मन चटक जाथे।


ढिंढोरा  पीट झन सब काम हो जाही

कभू निकले घलो फाइल लटक जाथे।


कहाँ काकर लिखे खाजी पता नइहे

बिला मा साँप मुसवा ला गटक जाथे।


सदा दिन मालकिन कस रौब हे झाड़े 

बहू के आय ले सब बल सटक जाथे।


इहाँ ईमान डोलत नइ लगे आशा

सगे भाई हा भाई ला झटक जाथे


आशा देशमुख

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