ग़ज़ल---चोवा राम 'बादल'
*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*
*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*
*2122 1122 1122 22*
बिन पढ़ाई के परीक्षा ह असो होवत हे
खेल शिक्षा ह बनिस देख न खो होवत हे
छत चढ़े रोज के तो फोन लगाथे बच्चा
आन लाइन म कथे पाठ सबो होवत हे
हे पछीना के असर खार भले ये हावय
धान हा लहलहा पथरा म तको होवत हे
राजा के मंत्री ल तो काय फरक परही जी
वो मरय चाहे सरय फेर हहो होवत हे
वोट पाके तैं टरक गेच कहाँ नेता जी
छोटकुन काम हमर आज न तो होवत हे
हाई हे बी पी ह बेटा के मिलत नइये काम
अउ ददा दाई के बी पी ह तो लो होवत हे
मूँद के आँखी ल तैं बइठे हवस का 'बादल'
देख अन्याय ल अब दुनिया म जो होवत हे
चोवा राम 'बादल'
हथबंद,छत्तीसगढ़
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