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Thursday, 7 January 2021

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

 गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रमल मुसम्मन मखबून महजूफ़ 

फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122  1122  1122  22 


नाम भगवान के निशदिन जपे कर चाहत हँव। 

रोज मंदिर म जा दर्शन करे कर चाहत हँव। 


मूर्ति तँय एक विधाता के बने बनवा ले। 

कर प्रतिष्ठा तहाँ पूजा करे कर चाहत हँव।


दान दाता बने मजबूर के पूरा कर दे। 

दीन दुखिया के सहारा बने कर चाहत हँव। 


ध्यान नइ जाय जिहाँ वास विधाता करथे। 

मूर्ति मन एक बसा नाम ले कर चाहत हँव। 


मूर्ति ला तँय कभू पथरा हरे बस झन कहिबे। 

राख विस्वास सदा तँय गढ़े कर चाहत हँव। 


लाख समझें भले पथरा हरे पथरा रइही। 

तोर भगवान ये सब ले कहे कर चाहत हँव। 


तोर विस्वास म भगवान बसे हे संगी। 

मान सच बात ला सच बर लड़े कर चाहत हँव। 


रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 

बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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