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Thursday, 7 January 2021

ग़ज़ल --इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"*🌹

 🌹 *ग़ज़ल --इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"*🌹


*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*


*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*


*1222 1222 1222*


बढ़त हे घूसखोरी चाटुकारी हा।

दिनों दिन लूट के धंधा उधारी हा।


रखे ईमान ला अब कोंन जी चलथे

चढ़े हे लोभ के जन जन खुमारी हा।


बँटे हे आज मनखे जाति धर मजहब

करत हे राज अब पंडा पुजारी हा।


लड़त हे भाई भाई चल कुमत रद्दा

कहाँ हे आज घर सुमता दुवारी हा।


नशा मा बेच डारिस खेत घर अँगना

धरे मुड़ हाथ अब रोवत दुलारी हा।



गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

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