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Thursday, 7 January 2021

गजल-अरुण कुमार निगम

गजल-अरुण कुमार निगम


*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*


*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*


*1212 1212 1212 1212*


किसिम किसिम के चीज मन भरे हवैं बजार मा

नगद नहीं हे जेब मा त लेग जा उधार मा।


पढ़े लिखे सपूत मन बिदेस मा चले गइन

खटत हवै सियान बाप रोज खेत-खार मा।


सगा रहिन मया रहिस तभे परब परब लगय

बिना मया बिना सगा मजा कहाँ तिहार मा।


जहर भरे हवा जिहाँ के साँस-साँस मा दरद

उहाँ कलम चले नहीं जी रूप मा सिंगार मा।


किसान ला अनाज के त भाव दे सकैं नहीं

"अरुण" उही मनन फिरत हवैं फरारी कार मा।


*अरुण कुमार निगम*

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