🌹 *ग़ज़ल -आशा देशमुख* 🌹
*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*
*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*
*2122 1122 1122 22*
मोड़ के लाव रे संगी ये नहर मा पानी
अब सुखावत हे सबो गाँव शहर मा पानी
बड़ परेशान हवे साँप के मुखिया मन हा
कोन करथे इहाँ मिलवट ये जहर मा पानी।
खेत बारी गए देखे धरे नइहे छत्ता
आत पहुना सही अमराय डहर मा पानी।
बैठ के डाल मा कउँवा हा तराना छेड़े
कोयली के फिरे सुर ताल बहर मा पानी।
काम अब्बड़ हे जरूरी उहाँ जावँव कइसे
झम झमाझम गिरे बिहने दोपहर मा पानी।
आशा देशमुख
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